22 फ़रवरी 2017


अवकाश की कमी

प्रेषक : धर्मेंद्र कुमार

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संध्या को मैं रह न सकूँगी . 
एक मित्र ने बुलवाया है 
कुछ विरोध में कह न सकूँगी . 

विद्यापति का फ़िल्म आया है,
हम दोनों को वह भाया है .
दुःख होगा यदि साथ न जाऊँ,
जिस दुःख को मैं सह न सकूँगी . 

मैं तो हूँगी शीघ्र रवाना, 
आज बना लेना तुम खाना .
आज रसोई की धारा में,
प्रियतम, मैं तो बह न सकूँगी .

शरबत भला बनाऊँ कैसे,
मोल मँगा लो देकर पैसे 
अभी-अभी क्यूटेक्स लगाया है
मैं दधिको मह न सकूँगी 
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