24 जनवरी 2017


कुछ सूखे फूलों के

प्रेषक : धर्मेंद्र कुमार

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कुछ सूखे फूलों के
गुलदस्तों की तरह
बासी शब्दों के
बस्तों को
फेंक नहीं पा रहा हूँ मैं

गुलदस्ते
जो सम्हालकर
रख लिये हैं
उनसे यादें जुड़ी हैं

शब्दों में भी
बसी हैं यादें
बिना खोले इन बस्तों को

बरसों से धरे हूँ
फेंकता नहीं हूँ
ना देता हूँ किसी शोधकर्ता को

बासे हो गये हैं शब्द
सूख गये हैं फूल
मगर नक़ली नहीं हैं वे न झूठे हैं!

सुनाई पड़ते हैं

प्रेषक : धर्मेंद्र कुमार

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सुनाई पड़ते हैं 
सुनाई पड़ते हैं कभी कभी 
उनके स्वर 
जो नहीं रहे 

दादाजी और बाई 
और गिरिजा और सरस 
और नीता
और प्रायः 
सुनता हूँ जो स्वर 
वे शिकायात के होते हैं 

की बेटा 
या भैया 
या मन्ना 

ऐसी-कुछ उम्मीद 
की थी तुमसे 
चुपचाप सुनता हूँ 
और ग़लतियाँ याद आती हैं 
दादाजी को 

अपने पास 
नहीं रख पाया 
उनके बुढ़ापे में 

निश्चय ही कर लेता 
तो ऐसा असंभव था क्या 
रखना उन्हें दिल्ली में 

पास नहीं था बाई के 
उनके अंतिम घड़ी में
हो नहीं सकता था क्या 

जेल भी चला गया था 
उनसे पूछे बिना 
गिरिजा!

और सरस 
और नीता तो 
बहुत कुछ कहते हैं 

जब कभी 
सुनाई पड़ जाती है 
इनमें से किसी की आवाज़ 
बहुत दिनों के लिए 
बेकाम हो जाता हूँ 
एक और आवाज़ 

सुनाई पड़ती है 
जीजाजी की 
वे शिकायत नहीं करते 

हंसी सुनता हूँ उनकी 
मगर हंसी में 
शिकायत का स्वर 
नहीं होता ऐसा नहीं है 
मैं विरोध करता हूँ इस रुख़ का 
प्यार क्यों नहीं देते 

चले जाकर अब दादाजी 
या बाई गिरिजा या सरस 
नीता और जीजाजी 

जैसा दिया करते थे तब 
जब मुझे उसकी 
उतनी ज़रुरत नहीं थी.

पूरे एक वर्ष

प्रेषक : धर्मेंद्र कुमार

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सो जाओ 
आशाओं 
सो जाओ संघर्ष 

पूरे एक वर्ष 
अगले 
पूरे वर्षभर 

मैं शून्य रहूँगा 
न प्रकृति से जूझूँगा
न आदमी से

देखूँगा
क्या मिलता है प्राण को
हर्ष की शोक की 

इस कमी से
इनके प्राचुर्य से तो
ज्वर मिले हैं

जब-जब 
फूल खिले हैं 
या जब-जब

उतरा है फसलों पर
तुषार
तो जो कुछ अनुभव है

वह बहुत हुआ तो
हवा है 
अगले बरस

अनुभव ना चाहता हूँ मैं 
शुद्ध जीवन का परस
बहना नहीं चाहता केवल

उसकी हवा के झोंकों में 
सो जाओ
आशाओं 

सो जाओ संघर्ष
पूरे एक वर्ष !

मैंने पूछा

प्रेषक : धर्मेंद्र कुमार

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मैंने पूछा
तुम क्यों आ गई
वह हँसी

और बोली
तुम्हें कुरूप से
 बचाने के लिए 

कुरूप है
ज़रुरत से ज़्यादा
धूप

मैं छाया हूँ
ज़रूरत से ज़्यादा धूप 
कुरूप है ना?

गीतफ़रोश (गीत बेचनेवाला)

प्रेषक : धर्मेंद्र कुमार

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जी हाँ हुजूर, मैं गीत बेचता हूँ,
मैं तरह-तरह के गीत बेचता हूँ,
मैं किसिम-किसिम के गीत बेचता हूँ!

जी, माल देखिए, दाम बताऊँगा,
बेकाम नहीं हैं, काम बताऊँगा,
कुछ गीत लिखे हैं मस्ती में मैंने,
कुछ गीत लिखे हैं पस्ती में मैंने,
यह गीत सख्त सर-दर्द भुलाएगा,
यह गीत पिया को पास बुलाएगा!

जी, पहले कुछ दिन शर्म लगी मुझको,
पर बाद-बाद में अक्ल जगी मुझको,
जी, लोगों ने तो बेच दिए ईमान,
जी, आप न हों सुन कर ज़्यादा हैरान-
मैं सोच समझ कर आखिर
अपने गीत बेचता हूँ,
जी हाँ हुजूर, मैं गीत बेचता हूँ,
मैं तरह-तरह के गीत बेचता हूँ,
मैं किसिम-किसिम के गीत बेचता हूँ!

यह गीत सुबह का है, गा कर देखें,
यह गीत गज़ब का है, ढा कर देखें,
यह गीत ज़रा सूने में लिक्खा था,
यह गीत वहाँ पूने में लिक्खा था,
यह गीत पहाड़ी पर चढ़ जाता है,
यह गीत बढ़ाए से बढ़ जाता है!

यह गीत भूख और प्यास भगाता है,
जी, यह मसान में भूख जगाता है,
यह गीत भुवाली की है हवा हुजूर,
यह गीत तपेदिक की है दवा है हुजूर,
जी, और गीत भी हैं दिखलाता हूँ,
जी, सुनना चाहें आप तो गाता हूँ।

जी, छंद और बेछंद पसंद करें,
जी अमर गीत और वे जो तुरत मरें!
ना, बुरा मानने की इसमें बात,
मैं ले आता हूँ, कलम और दवात,
इनमें से भाये नहीं, नये लिख दूँ,
जी, नए चाहिए नहीं, गए लिख दूँ!
मैं नए, पुराने सभी तरह के
गीत बेचता हूँ,
जी हाँ, हुजूर मैं गीत बेचता हूँ
मैं तरह-तरह के गीत बेचता हूँ।

मैं किसिम-किसिम के गीत बेचता हूँ!
जी, गीत जनम का लिखूँ मरण का लिखूँ,
जी, गीत जीत का लिखूँ, शरण का लिखूँ,
यह गीत रेशमी है, यह खादी का,
यह गीत पित्त का है, यह बादी का!
कुछ और डिजाइन भी हैं, यह इलमी,
यह लीजे चलती चीज़, नई फ़िल्मी,
यह सोच-सोच कर मर जाने का गीत,
यह दुकान से घर जाने का गीत!

जी नहीं, दिल्लगी की इसमें क्या बात,
मैं लिखता ही तो रहता हूँ दिन-रात,
तो तरह-तरह के बन जाते हैं गीत,
जी, रूठ-रूठ कर मन जाते हैं गीत!
जी, बहुत ढेर लग गया, हटाता हूँ,
गाहक की मर्ज़ी, अच्छा जाता हूँ,
या भीतर जाकर पूछ आइए आप,
है गीत बेचना वैसे बिलकुल पाप,
क्या करूँ मगर लाचार
हार कर गीत बेचता हूँ!
जी हाँ, हुजूर मैं गीत बेचता हूँ,
मैं किसिम-किसिम के गीत बेचता हूँ!

कहीं नहीं बचे

प्रेषक : धर्मेंद्र कुमार

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कहीं नहीं बचे
हरे वृक्ष
न ठीक सागर बचे हैं
न ठीक नदियाँ
पहाड़ उदास हैं
और झरने लगभग चुप
आँखों में
घिरता है अँधेरा घुप
दिन दहाड़े यों
जैसे बदल गई हो
तलघर में
दुनिया
कहीं नहीं बचे
ठीक हरे वृक्ष
कहीं नहीं बचा
ठीक चमकता सूरज
चांदनी उछालता
चांद
स्निग्धता बखेरते
तारे
काहे के सहारे खड़े
कभी की
उत्साहवन्त सदियाँ
इसीलिए चली
जा रही हैं वे
सिर झुकाये
हरेपन से हीन
सूखेपन की ओर
पंछियों के
आसमान में
चक्कर काटते दल
नजर नहीं आते
क्योंकि
बनाते थे
वे जिन पर घोंसले
वे वृक्ष
कट चुके हैं
क्या जाने
अधूरे और बंजर हम
अब और
किस बात के लिए रुके हैं
ऊबते क्यों नहीं हैं
इस तरंगहीनता
और सूखेपन से
उठते क्यों नहीं हैं यों
कि भर दें फिर से
धरती को
ठीक निर्झरों
नदियों पहाड़ों
वन से!

व्यक्तिगत

प्रेषक : धर्मेंद्र कुमार

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मैं कुछ दिनों से 
एक विचित्र 
सम्पन्नता में पड़ा हूँ

संसार का सब कुछ 
जो बड़ा है 
और सुन्दर है

व्यक्तिगत रूप से 
मेरा हो गया है
सुबह सूरज आता है तो 

मित्र की तरह 
मुझे दस्तक देकर
जगाता है

और मैं 
उठकर घूमता हूँ 
उसके साथ

लगभग 
डालकर हाथ में हाथ
हरे मैदानों भरे वृक्षों 

ऊँचे पहा़ड़ों 
खिली अधखिली 
कलियों के बीच 

और इनमें से 
हरे मैदान वृक्ष
पहाड़ गली 

और कली 
और फूल
व्यक्तिगत रूप से 

जैसे मेरे होते हैं 
मैं सबसे मिलता हूँ 
सब मुझसे मिलते हैं 

रितुएँ 
लगता है 
मेरे लिए आती हैं 

हवाएँ जब 
जो कुछ गाती हैं 
जैसे मेरे लिए गाती हैं 

हिरन 
जो चौकड़ी भरकर 
निकल जाता है मेरे सामने से 

सो शायद इसलिए 
कि गुमसुम था मेरा मन
थोड़ी देर से

शायद देखकर 
क्षिप्रगति हिरन की 
हिले-डुले वह थोड़ा-सा 

खुले 
झूठे उन बन्धनों से 
बँधकर जिनमे वह गुम था

आधी रात को
बंसी की टेर से 
कभी बुलावा जो आता है 

व्यक्तिगत होता है
मैं एक विचित्र सम्पन्नता में 
पड़ा हूँ कुछ दिनों से

और यह सम्पन्नता 
न मुझे दबाती है
न मुझे घेरती है

हलका छोड़े है मुझे
लगभग सूरज की किरन 
पेड़ के पत्ते

पंछी के गीत की तरह 
रितुओं की 
व्यक्तिगत रीत की तरह

सोने से सोने तक
उठता-बैठता नहीं लगता 
मैं अपने आपको 

एक ऐश्वर्य से 
दूसरे ऐश्वर्य में
पहुँचता हूँ जैसे 

कभी उनको तेज 
कभी सम
कभी गहरी धाराओं में 

सम्पन्नता से 
ऐसा अवभृथ स्नान 
चलता है रातों-दिन

लगता है 
एक नये ढंग का
चक्रवर्ती बनाया जा रहा हूँ

मैं एक व्यक्ति 
हर चीज़ के द्वारा 
व्यक्तिगत रूप से मनाया जा रहा हूँ !

11 जनवरी 2017


थोडी सी जमीं, थोड़ा आसमा

प्रेषक : धर्मेंद्र कुमार

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थोडी सी जमीं, थोड़ा आसमा
तिनकों का बस एक आशिया

माँगा है जो तुमसे वो ज्यादा तो नहीं है
देने को तो जान दे दे, वादा तो नहीं है
कोई तेरे वादों पे जीता है कहाँ

मेरे घर के आँगन में छोटा सा झूला हो
सौंधी सौंधी मिट्टी होगी, लेपा हुआ चूल्हा हो
थोड़ी थोड़ी आग होगी, थोड़ा सा धुआँ 

रात कट जायेगी तो कैसे दिन बिताएंगे
बाजरे के खेतों में कौए उड़ायेंगे
बाजरे के सिट्टों जैसे बेटे हो जवान
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