22 फ़रवरी 2017


अवकाश की कमी

प्रेषक : धर्मेंद्र कुमार

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संध्या को मैं रह न सकूँगी . 
एक मित्र ने बुलवाया है 
कुछ विरोध में कह न सकूँगी . 

विद्यापति का फ़िल्म आया है,
हम दोनों को वह भाया है .
दुःख होगा यदि साथ न जाऊँ,
जिस दुःख को मैं सह न सकूँगी . 

मैं तो हूँगी शीघ्र रवाना, 
आज बना लेना तुम खाना .
आज रसोई की धारा में,
प्रियतम, मैं तो बह न सकूँगी .

शरबत भला बनाऊँ कैसे,
मोल मँगा लो देकर पैसे 
अभी-अभी क्यूटेक्स लगाया है
मैं दधिको मह न सकूँगी 

बसंत ऋतु

प्रेषक : धर्मेंद्र कुमार

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आगया मधुमास आली
दिवसभर वह पाठ पढ़ते
नित्य प्रातः हैं टहलते 
और आधी रात तक तो 
जागती है सास आली; आ गया मधुमास आली 

जब कहा - मुझको दिखा दो 
एक दिन सिनेमा भला तो;
बोल उठे संध्या समय 
लगता हमारा क्लास आली; आ गया मधुमास आली

ढ़ाक और कचनार फूले 
आम के भी बौर झूले 
रट रहे हैं किन्तु वह 
तद्धित-कृदंत-समास आली; आ गया मधुमास आली

'सेंट' माँगा; सोप माँगा,
ह्रदय को कुछ होप माँगा 
हम यही कहते रहे --
हो जानी जब हम पास आली; आ गया मधुमास आली 

कहा -- सुनी भगवानसे

प्रेषक : धर्मेंद्र कुमार

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मुरली को राधिका के कर में सुपुर्द कर,
हाथ में हवाना का सिगार एक लीजिये.
दूध-दही-माखन को करके सलाम आप,
प्रात:काल चाय रात काकटेल पीजिये.

कूबरी औ राधिका को शीघ्र ही डिवोर्स कर,
सिनेमा-स्टार संग लेके रास कीजिये.
माथ प्लेन लेके नाथ उड़िए उसीपर, है 
गरुड़ पुराना उसे गोली मार दीजिये

रास रंग गोपी-संग भूल जाते सारा तुम,
होती बेकारी और होता यदि ठाला तुम्हें. 
छूट जाती चोरी सब दही छाछ माखन की,
यू. पी. की पुलिससे पड़ता जो पाला तुम्हें.

देखते उठाना गोबरधन तुम्हारा हम, 
मिलता जो खानेको घी भी घासवाला तुम्हें.
गोकुल को छोड़ आज मथुराको जाते यदि,
तुरत तलाक दे देतीं ब्रजबाला तुम्हें.

बाँसुरीको बहा देते यमुना में वंशीधर,
सुन पाते आप जो कहीं से ध्वनि बैंडकी.
फेंकते सुदर्शन-चक्र रद्दी की टोकरी में,
सिगरेट से शोभा बढ़ाते निज हैंड की 

सिनेमा को देख भूल जाते ब्रज-वीथियोंको 
भूल जाते गीता, देख नीति इंगलैंड की.
टेम्ज़के किनारे के सैंड देख ब्रज-रजको,
भूल जाते याद नहीं आती निज लैंड की.

मोरपंख मुकुट है जंगली तुम्हारा यह,
काले केश ऊपर मैं हैट धरवाऊँगा.
काछनी, दुपट्टा, बनमाल, लाल, सभ्य नहीं,
लंदन का सूट, गले टाई पहनाऊँगा. 

बंगले में मुझको सिंहासन मिलेगा नहीं,
कौच है चमड़े की उसपर बैठाऊँगा.
बीसवीं सदी का ग्रेजुएट युवक हूँ एक,
अपटूडेट होंगे तब मस्तक नवाऊँगा.

राजनीति वाले हम देखते तुम्हारी नीति,
द्वारिका में होते यदि मस्जिद, शिवाला.
गीता की तुमको भूल जाती फिलासफी सब,
अलिफ़-बे पढ़ना जो पड़ता नंदलाला.

देखते हम कैसे निपटती है वंशीधर, 
मिलता तुम्हें जो कोइ आई. सी. एस. वाला 
होते यदि बीसवीं सदी में आज भारत में,
पूछता न कोई जग कहता तुम्हें काला. 

निश्चय ही त्याग देते दही छाछ माखन भी,
पाते यदि कहीं आप बिस्कुट औ व्हिस्की
छोड़ देते राधिका को, कूबरी को, रुक्मणी को
देखते जो सूरत सुलोचना सी मिस की

नाम से मुसोलिनी के भाग जाते रन छोड़,
जिसका विरोध करे हिम्मत है किसकी
भागते यशोदा गोद हिटलर की बातें सुन,
यूरप थर्राता है गरज सुन जिसकी 

वन्दना

प्रेषक : धर्मेंद्र कुमार

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शारदे आज यह वर दे 
नैनों से भी तीखीतर हो
शिशुओं सी सर्वथा निडर हो 
व्यंग-विनोद- हास का घर हो 
तुझसी ही हे देवि अमर हो 
इस निब-वालीको मैं जैसा चाहूँ -- वैसा कर दे

इसमें रंग भरा हो काला
किन्तु जगत में करे उजाला 
जहाँ बनज हो रोनेवाला 
वहाँ गिरे यह बनकर पाला 
फाड़े यह पाखण्ड -- दंभके ताने हुए जो परदे

जैसी टेढ़ी अलकें काली 
मानों ऐंठी कोई ब्याली
हो यह टेढ़े शब्दों वाली 
किन्तु नहीं हो विष की प्याली 
इससे सुधा-बूँद बरसा अधरों पर सबके धर दे

भरा रहे रत्नाकर इसमें 
रसका भर दे सागर इसमें 
पाएँ लोग चराचर इसमें 
मस्ती के हो आखर इसमें 
जग को करदे मादक, इसमें वह मादकता भर दे

चूमे क्षितिज और अंबरको 
नक्षत्रों के लोक प्रवरको 
करै पराजित यह निर्झर को 
छूले मानव के अन्तर को 
उड़े कल्पना के समीर पर इसको ऐसा करदे

मूर्ख मनुज की वाह-वाह से
बिना ह्रदयवाली निगाह से
पैसों की स्वादिष्ट चाह से 
इन तीनों सागर अथाह से 
इक्यावन नम्बरवाली यह पार पारकर कर दे

नाँव मंत्री के अब रटींला हम

प्रेषक : धर्मेंद्र कुमार

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नाँव जेकर बहुत जपींला हम
ऊ त गुमनाम हौ सुनींला हम

शिव क, दुर्गा क पाठ का होई
नाँव मंत्री क अब रटींला हम

जब से देखलीं ह रंग हम ओनकर
मन ओही रंग में रँगींला हम

छ रुपइया किलो मलाई हौ
नाम खाली रटल करींला हम

घिव क नाहीं मिलत जलेबा हौ
चाह ओनके बदे धरींला हम

तू त भइलऽ सिमेंट क बोरिया
इंतजारी में नित मरींला हम

अस फँसउलन कि का कहीं भयवा
ऊ चरावेलँऽ आ चरींला हम

तू लड़ाई में पार का पइबऽ
राजनीतिक समर लड़ीला हम

लोग हम्‍मे कहेलन 'बेढब' हौ
बात ढब के मगर कहींला हम

वेदना

प्रेषक : धर्मेंद्र कुमार

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आह वेदना, मिली विदाई

निज शरीर की ठठरी लेकर
उपहारों की गठरी लेकर
जब पहुँचा मैं द्वार तुम्हारे
सपनों की सुषमा उर धारे
मिले तुम्हारे पूज्य पिताजी
मुझको कस कर डाँट बताई
आह वेदना, मिली विदाई

प्रची में ऊषा मुस्काई
तुमसे मिलने की सुधि आई
निकला घर से मैं मस्ताना
मिला राह में नाई काना
पड़ा पाँव के नीचे केला
बची टूटते आज कलाई्
आह वेदना, मिली विदाई

चला तुम्हारे घर से जैसे
मिले राह में मुझको भैंसे
किया आक्रमण सबने सत्वर
मानों मैं भूसे का गट्ठर
गिरा गटर में प्रिये आज
जीवन पर अपने थी बन आयी
आह वेदना, मिली विदाई

अब तो दया करो कुछ बाले
निहीं संभलता हृदय संभाले
शांति नहीं मिलती है दो क्षण
है कीटाणु प्रेम का भीषण
लव का मलहम शीघ्र लगाओ
कुछ तो समझो पीर पराई
आह वेदना, मिली विदाई

अगर कहीं मैं घोड़ा होता

प्रेषक : धर्मेंद्र कुमार

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अगर कहीं मैं घोड़ा होता
वह भी लंबा चौड़ा होता
तुम्हें पीठ पर बैठा कर के
बहुत तेज मैं दौड़ा होता

पलक झपकते ही ले जाता
दूर पहाड़ी की वादी में
बातें करता हुआ हवा से
बियाबान में आबादी में

किसी झोपड़े के आगे रुक
तुम्हें छाछ और दूध पिलाता
तरह तरह के भोले भोले
इंसानों से तुम्हें मिलाता

उनके संग जंगलों में जाकर
मीठे मीठे फल खाते
रंग बिरंगी चिड़ियों से
अपनी अच्छी पहचान बनाते

झाड़ी में दुबके तुमको प्यारे
प्यारे खरगोश दिखाता
और उछलते हुए मेमनों के संग
तुमको खेल खिालाता

रात ढमाढम ढोल झ्माझ्म
झांझ नाच गाने में कटती
हरे भरे जंगल में तुम्हें
दिखाता कैसे मस्ती कटती

सुबह नदी में नहा दिखाता
तुमको कैसे सूरज उगता
कैसे तीतर दौड़ लगाता
कैसे पिंडुक दाना चुगता

बगुले कैसे ध्यान लगाते
मछली शांत डोलती कैसे
और टिटहरी आसमान में
चक्कर काट बोलती कैसे

कैसे आते हिरन झुंड के झुंड
नदी में पानी पीते
कैसे छोड़ निशान पैर के
जाते हैं जंगल में चीते

हम भी वहां निशान छोड़कर
अपन फिर वापस आ जाते
शायद कभी खोजते उसको
और बहुत से बच्चे आते

तब मैं अपने पैर पटक
हिन हिन करता तुम भी खुश होते
कितनी नकली दुनियां यह अपनी
तुम सोते में भी यह कहते

लेकिन अपने मुंह में नहीं
लगाम डालने देता तुमको
प्यार उमड़ने पर वैसे छू
ळोने देता अपनी दुम को

नहीं दुलत्ती तुम्हें झाड़ता
क्योंकि उसे खा कर तुम रोते
लेकिन सच तो यह बच्चो
तब तुम ही मेरी दुम होते।

9 फ़रवरी 2017


दुश्मन की दोस्ती है

प्रेषक : धर्मेंद्र कुमार

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दुश्मन की दोस्ती है अब अहले वतन के साथ 
है अब खिजाँ चमन मे नए पैराहन के साथ 

सर पर हवाए ज़ुल्म चले सौ जतन के साथ 
अपनी कुलाह कज है उसी बाँकपन के साथ 

किसने कहा कि टूट गया खंज़रे फिरंग 
सीने पे ज़ख़्मे नौ भी है दाग़े कुहन के साथ 

झोंके जो लग रहे हैं नसीमे बहार के 
जुम्बिश में है कफ़स भी असीरे चमन के साथ 

मजरूह काफ़ले कि मेरे दास्ताँ ये है 
रहबर ने मिल के लूट लिया राहजन के साथ 

आँचल में सजा लेना कलियाँ जुल्फों में सितारे भर लेना

प्रेषक : धर्मेंद्र कुमार

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आँचल में सजा लेना कलियाँ जुल्फों में सितारे भर लेना 
ऐसे भी कभी जब शाम ढले तब याद हमें भी कर लेना 

आया था यहाँ बेगाना सा कहल दूंगा कहीं दीवाना सा 
दीवाने के खातिर तुम कोई इलज़ाम न अपने सर लेना 

रास्ता जो मिले अनजान कोई आ जाए अगर तूफान कोई 
अपने को अकेला जान के तुम आँखों मे न आंसूं भर लेना

पहले सौ बार इधर और उधर देखा है

प्रेषक : धर्मेंद्र कुमार

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पहले सौ बार इधर और उधर देखा है
तब कहीं डर के तुम्हें एक नज़र देखा है

हम पे हँसती है जो दुनियाँ उसे देखा ही नहीं
हम ने उस शोख को अए दीदा\-ए\-तर देखा है

आज इस एक नज़र पर मुझे मर जाने दो 
उस ने लोगों बड़ी मुश्किल से इधर देखा है

क्या ग़लत है जो मैं दीवाना हुआ, सच कहना
मेरे महबूब को तुम ने भी अगर देखा है

24 जनवरी 2017


कुछ सूखे फूलों के

प्रेषक : धर्मेंद्र कुमार

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कुछ सूखे फूलों के
गुलदस्तों की तरह
बासी शब्दों के
बस्तों को
फेंक नहीं पा रहा हूँ मैं

गुलदस्ते
जो सम्हालकर
रख लिये हैं
उनसे यादें जुड़ी हैं

शब्दों में भी
बसी हैं यादें
बिना खोले इन बस्तों को

बरसों से धरे हूँ
फेंकता नहीं हूँ
ना देता हूँ किसी शोधकर्ता को

बासे हो गये हैं शब्द
सूख गये हैं फूल
मगर नक़ली नहीं हैं वे न झूठे हैं!

सुनाई पड़ते हैं

प्रेषक : धर्मेंद्र कुमार

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सुनाई पड़ते हैं 
सुनाई पड़ते हैं कभी कभी 
उनके स्वर 
जो नहीं रहे 

दादाजी और बाई 
और गिरिजा और सरस 
और नीता
और प्रायः 
सुनता हूँ जो स्वर 
वे शिकायात के होते हैं 

की बेटा 
या भैया 
या मन्ना 

ऐसी-कुछ उम्मीद 
की थी तुमसे 
चुपचाप सुनता हूँ 
और ग़लतियाँ याद आती हैं 
दादाजी को 

अपने पास 
नहीं रख पाया 
उनके बुढ़ापे में 

निश्चय ही कर लेता 
तो ऐसा असंभव था क्या 
रखना उन्हें दिल्ली में 

पास नहीं था बाई के 
उनके अंतिम घड़ी में
हो नहीं सकता था क्या 

जेल भी चला गया था 
उनसे पूछे बिना 
गिरिजा!

और सरस 
और नीता तो 
बहुत कुछ कहते हैं 

जब कभी 
सुनाई पड़ जाती है 
इनमें से किसी की आवाज़ 
बहुत दिनों के लिए 
बेकाम हो जाता हूँ 
एक और आवाज़ 

सुनाई पड़ती है 
जीजाजी की 
वे शिकायत नहीं करते 

हंसी सुनता हूँ उनकी 
मगर हंसी में 
शिकायत का स्वर 
नहीं होता ऐसा नहीं है 
मैं विरोध करता हूँ इस रुख़ का 
प्यार क्यों नहीं देते 

चले जाकर अब दादाजी 
या बाई गिरिजा या सरस 
नीता और जीजाजी 

जैसा दिया करते थे तब 
जब मुझे उसकी 
उतनी ज़रुरत नहीं थी.

पूरे एक वर्ष

प्रेषक : धर्मेंद्र कुमार

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सो जाओ 
आशाओं 
सो जाओ संघर्ष 

पूरे एक वर्ष 
अगले 
पूरे वर्षभर 

मैं शून्य रहूँगा 
न प्रकृति से जूझूँगा
न आदमी से

देखूँगा
क्या मिलता है प्राण को
हर्ष की शोक की 

इस कमी से
इनके प्राचुर्य से तो
ज्वर मिले हैं

जब-जब 
फूल खिले हैं 
या जब-जब

उतरा है फसलों पर
तुषार
तो जो कुछ अनुभव है

वह बहुत हुआ तो
हवा है 
अगले बरस

अनुभव ना चाहता हूँ मैं 
शुद्ध जीवन का परस
बहना नहीं चाहता केवल

उसकी हवा के झोंकों में 
सो जाओ
आशाओं 

सो जाओ संघर्ष
पूरे एक वर्ष !

मैंने पूछा

प्रेषक : धर्मेंद्र कुमार

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मैंने पूछा
तुम क्यों आ गई
वह हँसी

और बोली
तुम्हें कुरूप से
 बचाने के लिए 

कुरूप है
ज़रुरत से ज़्यादा
धूप

मैं छाया हूँ
ज़रूरत से ज़्यादा धूप 
कुरूप है ना?

गीतफ़रोश (गीत बेचनेवाला)

प्रेषक : धर्मेंद्र कुमार

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जी हाँ हुजूर, मैं गीत बेचता हूँ,
मैं तरह-तरह के गीत बेचता हूँ,
मैं किसिम-किसिम के गीत बेचता हूँ!

जी, माल देखिए, दाम बताऊँगा,
बेकाम नहीं हैं, काम बताऊँगा,
कुछ गीत लिखे हैं मस्ती में मैंने,
कुछ गीत लिखे हैं पस्ती में मैंने,
यह गीत सख्त सर-दर्द भुलाएगा,
यह गीत पिया को पास बुलाएगा!

जी, पहले कुछ दिन शर्म लगी मुझको,
पर बाद-बाद में अक्ल जगी मुझको,
जी, लोगों ने तो बेच दिए ईमान,
जी, आप न हों सुन कर ज़्यादा हैरान-
मैं सोच समझ कर आखिर
अपने गीत बेचता हूँ,
जी हाँ हुजूर, मैं गीत बेचता हूँ,
मैं तरह-तरह के गीत बेचता हूँ,
मैं किसिम-किसिम के गीत बेचता हूँ!

यह गीत सुबह का है, गा कर देखें,
यह गीत गज़ब का है, ढा कर देखें,
यह गीत ज़रा सूने में लिक्खा था,
यह गीत वहाँ पूने में लिक्खा था,
यह गीत पहाड़ी पर चढ़ जाता है,
यह गीत बढ़ाए से बढ़ जाता है!

यह गीत भूख और प्यास भगाता है,
जी, यह मसान में भूख जगाता है,
यह गीत भुवाली की है हवा हुजूर,
यह गीत तपेदिक की है दवा है हुजूर,
जी, और गीत भी हैं दिखलाता हूँ,
जी, सुनना चाहें आप तो गाता हूँ।

जी, छंद और बेछंद पसंद करें,
जी अमर गीत और वे जो तुरत मरें!
ना, बुरा मानने की इसमें बात,
मैं ले आता हूँ, कलम और दवात,
इनमें से भाये नहीं, नये लिख दूँ,
जी, नए चाहिए नहीं, गए लिख दूँ!
मैं नए, पुराने सभी तरह के
गीत बेचता हूँ,
जी हाँ, हुजूर मैं गीत बेचता हूँ
मैं तरह-तरह के गीत बेचता हूँ।

मैं किसिम-किसिम के गीत बेचता हूँ!
जी, गीत जनम का लिखूँ मरण का लिखूँ,
जी, गीत जीत का लिखूँ, शरण का लिखूँ,
यह गीत रेशमी है, यह खादी का,
यह गीत पित्त का है, यह बादी का!
कुछ और डिजाइन भी हैं, यह इलमी,
यह लीजे चलती चीज़, नई फ़िल्मी,
यह सोच-सोच कर मर जाने का गीत,
यह दुकान से घर जाने का गीत!

जी नहीं, दिल्लगी की इसमें क्या बात,
मैं लिखता ही तो रहता हूँ दिन-रात,
तो तरह-तरह के बन जाते हैं गीत,
जी, रूठ-रूठ कर मन जाते हैं गीत!
जी, बहुत ढेर लग गया, हटाता हूँ,
गाहक की मर्ज़ी, अच्छा जाता हूँ,
या भीतर जाकर पूछ आइए आप,
है गीत बेचना वैसे बिलकुल पाप,
क्या करूँ मगर लाचार
हार कर गीत बेचता हूँ!
जी हाँ, हुजूर मैं गीत बेचता हूँ,
मैं किसिम-किसिम के गीत बेचता हूँ!

कहीं नहीं बचे

प्रेषक : धर्मेंद्र कुमार

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कहीं नहीं बचे
हरे वृक्ष
न ठीक सागर बचे हैं
न ठीक नदियाँ
पहाड़ उदास हैं
और झरने लगभग चुप
आँखों में
घिरता है अँधेरा घुप
दिन दहाड़े यों
जैसे बदल गई हो
तलघर में
दुनिया
कहीं नहीं बचे
ठीक हरे वृक्ष
कहीं नहीं बचा
ठीक चमकता सूरज
चांदनी उछालता
चांद
स्निग्धता बखेरते
तारे
काहे के सहारे खड़े
कभी की
उत्साहवन्त सदियाँ
इसीलिए चली
जा रही हैं वे
सिर झुकाये
हरेपन से हीन
सूखेपन की ओर
पंछियों के
आसमान में
चक्कर काटते दल
नजर नहीं आते
क्योंकि
बनाते थे
वे जिन पर घोंसले
वे वृक्ष
कट चुके हैं
क्या जाने
अधूरे और बंजर हम
अब और
किस बात के लिए रुके हैं
ऊबते क्यों नहीं हैं
इस तरंगहीनता
और सूखेपन से
उठते क्यों नहीं हैं यों
कि भर दें फिर से
धरती को
ठीक निर्झरों
नदियों पहाड़ों
वन से!

व्यक्तिगत

प्रेषक : धर्मेंद्र कुमार

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मैं कुछ दिनों से 
एक विचित्र 
सम्पन्नता में पड़ा हूँ

संसार का सब कुछ 
जो बड़ा है 
और सुन्दर है

व्यक्तिगत रूप से 
मेरा हो गया है
सुबह सूरज आता है तो 

मित्र की तरह 
मुझे दस्तक देकर
जगाता है

और मैं 
उठकर घूमता हूँ 
उसके साथ

लगभग 
डालकर हाथ में हाथ
हरे मैदानों भरे वृक्षों 

ऊँचे पहा़ड़ों 
खिली अधखिली 
कलियों के बीच 

और इनमें से 
हरे मैदान वृक्ष
पहाड़ गली 

और कली 
और फूल
व्यक्तिगत रूप से 

जैसे मेरे होते हैं 
मैं सबसे मिलता हूँ 
सब मुझसे मिलते हैं 

रितुएँ 
लगता है 
मेरे लिए आती हैं 

हवाएँ जब 
जो कुछ गाती हैं 
जैसे मेरे लिए गाती हैं 

हिरन 
जो चौकड़ी भरकर 
निकल जाता है मेरे सामने से 

सो शायद इसलिए 
कि गुमसुम था मेरा मन
थोड़ी देर से

शायद देखकर 
क्षिप्रगति हिरन की 
हिले-डुले वह थोड़ा-सा 

खुले 
झूठे उन बन्धनों से 
बँधकर जिनमे वह गुम था

आधी रात को
बंसी की टेर से 
कभी बुलावा जो आता है 

व्यक्तिगत होता है
मैं एक विचित्र सम्पन्नता में 
पड़ा हूँ कुछ दिनों से

और यह सम्पन्नता 
न मुझे दबाती है
न मुझे घेरती है

हलका छोड़े है मुझे
लगभग सूरज की किरन 
पेड़ के पत्ते

पंछी के गीत की तरह 
रितुओं की 
व्यक्तिगत रीत की तरह

सोने से सोने तक
उठता-बैठता नहीं लगता 
मैं अपने आपको 

एक ऐश्वर्य से 
दूसरे ऐश्वर्य में
पहुँचता हूँ जैसे 

कभी उनको तेज 
कभी सम
कभी गहरी धाराओं में 

सम्पन्नता से 
ऐसा अवभृथ स्नान 
चलता है रातों-दिन

लगता है 
एक नये ढंग का
चक्रवर्ती बनाया जा रहा हूँ

मैं एक व्यक्ति 
हर चीज़ के द्वारा 
व्यक्तिगत रूप से मनाया जा रहा हूँ !

11 जनवरी 2017


थोडी सी जमीं, थोड़ा आसमा

प्रेषक : धर्मेंद्र कुमार

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थोडी सी जमीं, थोड़ा आसमा
तिनकों का बस एक आशिया

माँगा है जो तुमसे वो ज्यादा तो नहीं है
देने को तो जान दे दे, वादा तो नहीं है
कोई तेरे वादों पे जीता है कहाँ

मेरे घर के आँगन में छोटा सा झूला हो
सौंधी सौंधी मिट्टी होगी, लेपा हुआ चूल्हा हो
थोड़ी थोड़ी आग होगी, थोड़ा सा धुआँ 

रात कट जायेगी तो कैसे दिन बिताएंगे
बाजरे के खेतों में कौए उड़ायेंगे
बाजरे के सिट्टों जैसे बेटे हो जवान
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