14 दिसंबर 2016


हम को जुनूँ क्या सिखलाते हो

प्रेषक : धर्मेंद्र कुमार

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हम को जुनूँ क्या सिखलाते हो हम थे परेशाँ तुमसे ज़ियादा 
चाक किये हैं हमने अज़ीज़ों चार गरेबाँ तुमसे ज़ियादा 

चाक-ए-जिगर मुहताज-ए-रफ़ू है आज तो दामन सिर्फ़ लहू है 
एक मौसम था हम को रहा है शौक़-ए-बहाराँ तुमसे ज़ियादा 

जाओ तुम अपनी बाम की ख़ातिर सारी लवें शमों की कतर लो 
ज़ख़्मों के महर-ओ-माह सलामत जश्न-ए-चिराग़ाँ तुमसे ज़ियादा 

हम भी हमेशा क़त्ल हुए अन्द तुम ने भी देखा दूर से लेकिन 
ये न समझे हमको हुआ है जान का नुकसाँ तुमसे ज़ियादा 

ज़ंजीर-ओ-दीवार ही देखी तुमने तो "मजरूह" मगर हम 
कूचा-कूचा देख रहे हैं आलम-ए-ज़िंदाँ तुमसे ज़ियादा 

13 दिसंबर 2016


घर-धाम

प्रेषक : धर्मेंद्र कुमार

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मैं अब हो गया हूँ निढाल
अर्थहीन कार्यों में
नष्ट कर दिए
मैंने
       साल-पर-साल
             न जाने कितने साल!
             - और अब भी
             मैं नहीं जान पाया
                  है कहाँ मेरा योग?

मैं अब घर जाना चाहता हूँ
मैं जंगलों
पहाड़ों में
       खो जाना चाहता हूँ
             मैं महुए के
                   वन में

       एक कंडे सा
       सुलगना, गुँगुवाना
       धुँधुवाना
       चाहता हूँ।

मैं जीना चाहता हूँ
और जीवन को
       भासमान
       करना चाहता हूँ।
मैं कपास धुनना चाहता हूँ
या
फावड़ा उठाना
       चाहता हूँ
       या
       गारे पर ईंटें
       बिठाना
            चाहता हूँ
            या पत्थरी नदी के एक ढोंके पर
                  जाकर
                      बैठ जाना
                            चाहता हूँ
मैं जंगलों के साथ
       सुगबुगाना चाहता हूँ
       और शहरों के साथ
             चिलचिलाना
                   चाहता हूँ

      मैं अब घर जाना चाहता हूँ

मैं विवाह करना चाहता हूँ
और
   उसे प्यार
      करना चाहता हूँ
        मैं उसका पति
          उसका प्रेमी
            और
              उसका सर्वस्व
                उसे देना चाहता हूँ
                     और
                       उसकी गोद
                        भरना चाहता हूँ।

मैं अपने आसपास
   अपना एक लोक
     रचना चाहता हूँ।
       मैं उसका पति, उसका प्रेमी
          और
          उसका सर्वस्व
           उसे देना चाहता हूँ
            और
              पठार
                ओढ़ लेना
                  चाहता हूँ।
मैं समूचा आकाश
   इस भुजा पर
      ताबीज की तरह
        बाँध
         लेना चाहता हूँ।
मैं महुए के बन में
     एक कंडे-सा
       सुलगना, गुँगुवाना
          धुँधुवाना चाहता हूँ।
            मैं अब घर
             जाना चाहता हूँ।

काशी में शव

प्रेषक : धर्मेंद्र कुमार

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तुमने देखी है काशी?
जहाँ, जिस रास्ते
जाता है शव -
उसी रास्ते
आता है शव!

शवों का क्या
शव आएँगे,
शव जाएँगे -

पूछो तो, किसका है यह शव?
रोहिताश्व का?
नहीं, नहीं,
हर शव रोहिताश्व नहीं हो सकता

जो होगा
दूर से पहचाना जाएगा
दूर से नहीं, तो
पास से -
और अगर पास से भी नहीं,
तो वह
रोहिताश्व नहीं हो सकता
और अगर हो भी तो
क्या फर्क पड़ेगा?

मित्रो,
तुमने तो देखी है काशी,
जहाँ, जिस रास्ते
जाता है शव
उसी रास्ते
आता है शव!
तुमने सिर्फ यही तो किया
रास्ता दिया
और पूछा -
किसका है यह शव?

जिस किसी का था,
और किसका नहीं था,
कोई फर्क पड़ा ?

काशी का न्याय

प्रेषक : धर्मेंद्र कुमार

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सभा बरखास्त हो चुकी
सभासद चलें

जो होना था सो हुआ
अब हम, मुँह क्यों लटकाए हुए हैं?
क्या कशमकश है?
किससे डर रहे हैं?

फैसला हमने नहीं लिया -
सिर हिलाने का मतलब फैसला लेना नहीं होता
हमने तो सोच-विचार तक नहीं किया

बहसियों ने बहस की
हमने क्या किया?

हमारा क्या दोष?
न हम सभा बुलाते हैं
न फैसला सुनाते हैं
वर्ष में एक बार
काशी आते हैं -
सिर्फ यह कहने के लिए
कि सभा बुलाने की भी आवश्यकता नहीं
हर व्यक्ति का फैसला
जन्म के पहले हो चुका है।

एक और ढंग

प्रेषक : धर्मेंद्र कुमार

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भागकर अकेलेपन से अपने
  तुममें मैं गया।
    सुविधा के कई वर्ष
     तुमने व्यतीत किए।
         कैसे?
           कुछ स्मरण नहीं।

 मैं और तुम! अपनी दिनचर्या के
         पृष्ठ पर
            अंकित थे
              एक संयुक्ताक्षर!

क्या कहूँ! लिपि को नियति
    केवल लिपि की नियति
       थी -
         तुममें से होकर भी,
            बसकर भी
           संग-संग रहकर भी
                 बिलकुल असंग हूँ।

सच है तुम्हारे बिना जीवन अपंग है
      - लेकिन! क्यों लगता है मुझे
             प्रेम
               अकेले होने का ही
                   एक और ढंग है।

भद्रवंश के प्रेत

प्रेषक : धर्मेंद्र कुमार

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छज्जों और आईनों, ट्रेनों और दूरबीन
कारों और पुस्तकों
यानी सुविधाओं के अद्वितीय चश्मों से
मुझे देखने वाले
अपमानित नगरों में सम्मानित नागरिकों
मुझे ध्यान से देखो
जेबी झिल्लियाँ सब उतार
मुझे नंगी आँखों देखो
पहिचानो।

मैं इस इतिहास के अँधेरे में, एक सड़ी और
फूली लाश सा
घिसटने वाला प्राणी कौन हूँ
ओ विपन्न सदियों के प्रभुजन, सम्पन्न जन।
मुझको पहिचानो
कुबडे, बूढे, कोढी, दैत्य सा तुम्हारे
हॉलो, शेल्फों, ड्रायर या ड्रेसिंग टेबल में
छिपने वाला प्राणी मैं कौन हूँ
पहिचानो, मुझको पहिचानो।

मेरी इस कूबड़ को जरा पास से देखो
मेरी गिलगिली पिलपिली बाँहें अपनें
दास्तानों से परे
अँगुलियों से महसूस करो
शायद तुमने इनको ग्रीवा के गिर्द कभी
पुष्प के धनुष सा भेंटा हो।

मुझसे मत बिचको
मुझे, घृणा की सिकुड़ी आँखों मत देखो
मुझसे मत भागो।
मेरे सिकुड़े टेढे ओठों पर ओठ रखो।
शायद तुमने इनमे कभी
किसी का
पूरा माँसल अस्तित्व कहीं भोगा होगा।
मेरी बह रही लार पर मत घिन लाओ
यह तुम हो
जो मुझसे हो कर गुजरे थे।
मेरी गल रही अंगुलियाँ देखो
पहचानो।
क्या मेरे सारे हस्ताक्षर धुंधला गये?
क्यों तुम मुझसे हरदम कटते हो?
क्यों मैं तुम्हारे सपनों में आ धमकता हूँ?
क्यों मैं तुम्हारे बच्चों को नहीं दिखता?
तुमको ही दिखता हूँ
जाओ
अपने बच्चों से पूछो।

ऊब

प्रेषक : धर्मेंद्र कुमार

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स्वेद में डूबे हुए सब जन्म पर पछता रहे हैं
पालने में शिशु।
चौंक या खिसिया रहे या पेड़ पर फन्दा लगा कर
आत्महत्या कर रहे हैं
शहर के मैदान।

उमस में डूबे हुए हैं घर सबेरा
घोंसले और घास
आ रहा या जा रहा है बक रहा या झक रहा है
निरर्थक कोई किसी के पास। 
मृत्युधर्मी प्रेम अथवा प्रेमधर्मी मृत्यु;
अकारण चुम्बन तड़ातड़
अकारण सहवास।
हारकर सब लड़ रहे हैं
हारकर सब पूर्वजों से
झगड़ते पत्तों सरीखे झर रहे हैं
घूम कर प्रत्येक छत पर
उतर आया शहर का आकाश
हर दिवस मौसम बदलने की प्रतीक्षा कर रहे हैं
हर घड़ी दुनिया बदलने की प्रतीक्षा कर रहे हैं।
भाग कर त्यौहार में
हैं युद्ध की तैयारियों में व्यस्त
एक दुनियाँ से निकल कर दूसरी में जा रहे हैं
युद्ध, चुम्बन, पालने ले।
स्वेद में डूबे हुए सब जन्म पर पछता रहे हैं।

महामहिम!

प्रेषक : धर्मेंद्र कुमार

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महामहिम!
चोर दरवाज़े से निकल चलिए !
बाहर
हत्यारे हैं !

बहुक़्म आप
खोल दिए मैनें
जेल के दरवाज़े,
तोड़ दिया था
करोड़ वर्षों का सन्नाटा

महामहिम !
डरिए ! निकल चलिए !
किसी की आँखों में 
हया नहीं
ईश्वर का भय नहीं
कोई नहीं कहेगा
"धन्यवाद" !

सब के हाथों में
कानून की किताब है
हाथ हिला पूछते हैं,
किसने लिखी थी
यह कानून की किताब ?

आस्था की प्रतिध्वनियां

प्रेषक : धर्मेंद्र कुमार

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जीवन का तीर्थ बनी जीवन की आस्था।
आंसू के कलश लिए
हम तुम तक आती हैं।
हम तेरी पुत्री हैं, तेरी प्रतिध्वनियां हैं।
अपने अनागत को
हम यम के पाशों से वापस ले आने को आतुर हैं।
जीवन का तीर्थ बनी ओ मन की आस्था!
अंधकार में हमने जन्म लिया
और बढी,
रुइयों-सी हम, दैनिक द्वंद्वों में धुनी गईं।
कष्टों में बटी गईं,
सिसकी बन सुनी गईं,
हम सब विद्रोहिणियां कारा में चुनी गईं।
लेकिन कारा हमको
रोक नहीं सकती है,
रोक नहीं सकती है,
रोक नहीं सकती है!
जन-जन का तीर्थ बनी ओ जन की आस्था!

मीरा-सी जहर पिए
हम तुझ तक आती हैं।
हम सब सरिताएं हैं।
समय की धमनियां हैं,
समय की शिराएं हैं।
समय का हृदय हमको चिर-जीवित रखना है।
इसीलिए हम इतनी तेजी से दौड रहीं,
रथ अपने मोड रहीं,
पथ पिछले छोड रहीं,
परम्परा तोड रहीं।

लौ बनकर हम युग के कुहरे को दाग रहीं।
सन्नाटे में ध्वनियां बनकर हम जाग रहीं।
जीवन का तीर्थ बनी, जीवन की आस्था।

टूटी पडी है परम्परा

प्रेषक : धर्मेंद्र कुमार

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टूटी पडी है परम्परा
शिव के धनुष-सी रखी रही परम्परा
कितने निपुण आए-गए
धनुर्धारी।
कौन इसे बौहे? और कौन इसे
कानों तक खींचे?
एक प्रश्नचिह्न-सी पडी रही परम्परा।
मैं सबमें छोटा और सबसे अल्पायु-
मैं भविष्यवासी।
मैंने छुआ ही था, जीवित हो उठी।
मैंने जो प्रत्यंचा खींची
तो टूट गई परम्परा।
मुझ पर दायित्व।
कंधों पर मेरे ज्यों, सहसा रख दी हो
किसी ने वसुंधरा।
सौंप मझे मर्यादाहीन लोक
टूटी पडी है परम्परा।
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