8 नवंबर 2016


कोसल में विचारों की कमी है

प्रेषक : धर्मेंद्र कुमार

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महाराज बधाई हो; महाराज की जय हो !

युद्ध नहीं हुआ –

लौट गये शत्रु ।


वैसे हमारी तैयारी पूरी थी !

चार अक्षौहिणी थीं सेनाएं

दस सहस्र अश्व

लगभग इतने ही हाथी ।


कोई कसर न थी ।

युद्ध होता भी तो

नतीजा यही होता ।


न उनके पास अस्त्र थे

न अश्व

न हाथी

युद्ध हो भी कैसे सकता था !

निहत्थे थे वे ।


उनमें से हरेक अकेला था

और हरेक यह कहता था

प्रत्येक अकेला होता है !

जो भी हो

जय यह आपकी है ।

बधाई हो !


राजसूय पूरा हुआ

आप चक्रवर्ती हुए –


वे सिर्फ़ कुछ प्रश्न छोड़ गये हैं

जैसे कि यह –

कोसल अधिक दिन नहीं टिक सकता

कोसल में विचारों की कमी है ।

राजनीतिज्ञों ने मुझे

प्रेषक : धर्मेंद्र कुमार

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राजनीतिज्ञों ने मुझे पूरी तरह भुला 
दिया।
अच्छा ही हुआ।
मुझे भी उन्हें भुला देना चाहिये।

बहुत से मित्र हैं, जिन्होंने आँखे फेर 
ली हैं,
कतराने लगे हैं
शायद वे सोचते हैं 
अब मेरे पास बचा क्या है?

मैं उन्हें क्या दे सकता हूँ?
और यह सच है
मैं उन्हे कुछ नहीं दे सकता।
मगर कोई मुझसे
मेरा "स्वत्व" नहीं छीन सकता।
मेरी कलम नहीं छीन सकता

यह कलम
जिसे मैंने राजनीति के धूल- धक्कड़ के बीच भी
हिफाजत से रखा
हर हालत में लिखता रहा

पूछो तो इसी के सहारे 
जीता रहा
यही मेरी बैसाखी थी
इसी ने मुझसे बार बार कहा,
"हारिये ना हिम्मत बिसारिये ना राम।"
हिम्मत तो मैं कई बार हारा
मगर राम को मैंने
कभी नहीं बिसारा।
यही मेरी कलम
जो इस तरह मेरी है कि किसी और की
नहीं हो सकती
मुझे भवसागर पार करवाएगी
वैतरणी जैसे भी
हो,
पार कर ही लूँगा।

कुछ का व्यवहार बदल गया

प्रेषक : धर्मेंद्र कुमार

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कुछ का व्यवहार बदल गया। कुछ का नहीं 
बदला।
जिनसे उम्मीद थी, नहीं बदलेगा
उनका बदल गया।
जिनसे आशंका थी,
नहीं बदला।
जिन्हें कोयला मानता था
हीरों की तरह 
चमक उठे।
जिन्हें हीरा मानता था
कोयलों की तरह 
काले निकले।

सिर्फ अभी रुख बदला है, आँखे बदली है,
रास्ता बदला है।
अभी देखो
क्या होता है,
क्या क्या नहीं होता।
अभी तुम सड़कों पर घसीटे जाओगे,
अभी तुम घसिआरे पुकारे जाओगे
अभी एक एक करके
सभी खिड़कियाँ बन्द होंगी
और तब भी तुम अपनी 
खिड़की खुली 
रखोगे,
इस डर से कि 
जरा सी भी अपनी 
खिड़की बन्द की तो
बाहर से एक पत्थर
एक घृणा का पत्थर
एक हीनता का पत्थर
एक प्रतिद्वन्दिता का पत्थर
एक विस्मय का पत्थर
एक मानवीय पत्थर
एक पैशाचिक पत्थर
एक दैवी पत्थर
तुम्हारी खिड़की के शीशे तोड़ कर जाएगा
और तुम पहले से अधिक विकृत नजर आओगे
पहले से अधिक
बिलखते बिसूरते नजर पड़ोगे
जैसा कि तुम दिखना नहीं चाहते
दिखाई पड़ोगे।

यह कोई पहली बार नहीं है
जब तुम्हें मार पड़ी है
कम से कम तीन तो
आज को मिला कर
हो चुके
मतलब है तीन बार,
मार।
और ऐसी मार कि तीनों बार
बिलबिला गया
निराला की कविता याद आती है
"जब कड़ी मारे पड़ीं,
दिल हिल गया।"

निरापद कोई नहीं है

प्रेषक : धर्मेंद्र कुमार

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ना निरापद कोई नहीं है
न तुम, न मैं, न वे
न वे, न मैं, न तुम
सबके पीछे बंधी है दुम आसक्ति की!

आसक्ति के आनन्द का छंद ऐसा ही है
इसकी दुम पर 
पैसा है!

ना निरापद कोई नहीं है
ठीक आदमकद कोई नहीं है
न मैं, न तुम, न वे
न तुम, न मैं, न वे

कोई है कोई है कोई है 
जिसकी ज़िंदगी 
दूध की धोई है

ना, दूध किसी का धोबी नहीं है
हो तो भी नहीं है!

जंगल के राजा !

प्रेषक : धर्मेंद्र कुमार

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जंगल के राजा, सावधान !
ओ मेरे राजा, सावधान !
                     कुछ अशुभ शकुन हो रहे आज l 
           जो दूर शब्द सुन पड़ता है,
           वह मेरे जी में गड़ता है,
                     रे इस हलचल पर पड़े गाज l 
           ये यात्री या कि किसान नहीं,
           उनकी-सी इनकी बान नहीं,
                     चुपके चुपके यह बोल रहे । 
           यात्री होते तो गाते तो,
           आगी थोड़ी सुलगाते तो,
                     ये तो कुछ विष-सा बोल रहे । 
           वे एक एक कर बढ़ते हैं,
           लो सब झाड़ों पर चढ़ते हैं,
                     राजा ! झाड़ों पर है मचान । 
           जंगलके राजा, सावधान !
                     ओ मेरे राजा, सावधान !
           राजा गुस्से में मत आना,
           तुम उन लोगों तक मत जाना ;
                     वे सब-के-सब हत्यारे हैं । 
          वे दूर बैठकर मारेंगे,
          तुमसे कैसे वे हारेंगे,
                     माना, नख तेज़ तुम्हारे हैं । 
           "ये मुझको खाते नहीं कभी,
            फिर क्यों मारेंगे मुझे अभी ?"
                     तुम सोच नहीं सकते राजा । 
            तुम बहुत वीर हो, भोले हो,
            तुम इसीलिए यह बोले हो,
                     तुम कहीं सोच सकते राजा । 
            ये भूखे नहीं पियासे हैं,
            वैसे ये अच्छे खासे हैं,
                     है 'वाह वाह' की प्यास इन्हें । 
            ये शूर कहे जायँगे तब,
            और कुछ के मन भाएँगे तब,
                     है चमड़े की अभिलाष इन्हें,
             ये जग के, सर्व-श्रेष्ठ प्राणी,
             इनके दिमाग़, इनके वाणी,
                     फिर अनाचार यह मनमाना !
             राजा, गुस्से में मत आना,
                     तुम उन लोगों तक मत जाना ।

आभार

प्रेषक : धर्मेंद्र कुमार

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जिस जिससे पथ पर स्नेह मिला
उस उस राही को धन्यवाद।

जीवन अस्थिर अनजाने ही
हो जाता पथ पर मेल कहीं
सीमित पग-डग, लम्बी मंज़िल
तय कर लेना कुछ खेल नहीं

दाएँ-बाएँ सुख-दुख चलते
सम्मुख चलता पथ का प्रमाद
जिस जिससे पथ पर स्नेह मिला
उस उस राही को धन्यवाद।

साँसों पर अवलम्बित काया
जब चलते-चलते चूर हुई
दो स्नेह-शब्द मिल गए, मिली
नव स्फूर्ति थकावट दूर हुई

पथ के पहचाने छूट गए
पर साथ-साथ चल रही याद
जिस जिससे पथ पर स्नेह मिला
उस उस राही को धन्यवाद।

जो साथ न मेरा दे पाए
उनसे कब सूनी हुई डगर
मैं भी न चलूँ यदि तो भी क्या
राही मर लेकिन राह अमर

इस पथ पर वे ही चलते हैं
जो चलने का पा गए स्वाद
जिस जिससे पथ पर स्नेह मिला
उस उस राही को धन्यवाद।

कैसे चल पाता यदि न मिला
होता मुझको आकुल-अन्तर
कैसे चल पाता यदि मिलते
चिर-तृप्ति अमरता-पूर्ण प्रहर

आभारी हूँ मैं उन सबका
दे गए व्यथा का जो प्रसाद
जिस जिससे पथ पर स्नेह मिला
उस उस राही को धन्यवाद।

सूनी साँझ

प्रेषक : धर्मेंद्र कुमार

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बहुत दिनों में आज मिली है
साँझ अकेली, साथ नहीं हो तुम।

पेड खडे फैलाए बाँहें
लौट रहे घर को चरवाहे
यह गोधुली, साथ नहीं हो तुम,

बहुत दिनों में आज मिली है
साँझ अकेली, साथ नहीं हो तुम।

कुलबुल कुलबुल नीड़-नीड़ में
चहचह चहचह मीड़-मीड़ में
धुन अलबेली, साथ नहीं हो तुम,

बहुत दिनों में आज मिली है
साँझ अकेली, साथ नहीं हो तुम।

जागी-जागी सोई-सोई
पास पडी है खोई-खोई
निशा लजीली, साथ नहीं हो तुम,

बहुत दिनों में आज मिली है
साँझ अकेली, साथ नहीं हो तुम।

ऊँचे स्वर से गाते निर्झर
उमडी धारा, जैसी मुझपर-
बीती झेली, साथ नहीं हो तुम,

बहुत दिनों में आज मिली है
साँझ अकेली, साथ नहीं हो तुम।

यह कैसी होनी-अनहोनी
पुतली-पुतली आँख मिचौनी
खुलकर खेली, साथ नहीं हो तुम,

बहुत दिनों में आज मिली है
साँझ अकेली, साथ नहीं हो तुम।

याद

प्रेषक : धर्मेंद्र कुमार

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बिदा हो गई साँझ, विनत मुख पर झीना आँचल धर,
मेरे एकाकी आँगन में मौन मधुर स्मृतियाँ भर!
वह केसरी दुकूल अभी भी फहरा रहा क्षितिज पर,
नव असाढ़ के मेघों से घिर रहा बराबर अंबर!

मैं बरामदे में लेटा, शैय्या पर, पीड़ित अवयव, 
मन का साथी बना बादलों का विषाद है नीरव! 
सक्रिय यह सकरुण विषाद,--मेघों से उमड़ उमड़ कर 
भावी के बहु स्वप्न, भाव बहु व्यथित कर रहे अंतर!

मुखर विरह दादुर पुकारता उत्कंठित भेकी को, 
बर्हभार से मोर लुभाता मेघ-मुग्ध केकी को; 
आलोकित हो उठता सुख से मेघों का नभ चंचल, 
अंतरतम में एक मधुर स्मृति जग जग उठती प्रतिपल!

कम्पित करता वक्ष धरा का घन गभीर गर्जन स्वर, 
भू पर ही आगया उतर शत धाराओं में अंबर! 
भीनी भीनी भाप सहज ही साँसों में घुल मिल कर 
एक और भी मधुर गंध से हृदय दे रही है भर!

नव असाढ़ की संध्या में, मेघों के तम में कोमल, 
पीड़ित एकाकी शय्या पर, शत भावों से विह्वल, 
एक मधुरतम स्मृति पल भर विद्युत सी जल कर उज्वल 
याद दिलाती मुझे हृदय में रहती जो तुम निश्चल!

मैं सबसे छोटी होऊँ

प्रेषक : धर्मेंद्र कुमार

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मैं सबसे छोटी होऊँ,
तेरी गोदी में सोऊँ,
तेरा अंचल पकड़-पकड़कर
फिरू सदा माँ! तेरे साथ,
कभी न छोड़ूँ तेरा हाथ!
बड़ा बनकर पहले हमको
तू पीछे छलती है मात!
हाथ पकड़ फिर सदा हमारे
साथ नहीं फिरती दिन-रात!
अपने कर से खिला, धुला मुख,
धूल पोंछ, सज्जित कर गात,
थमा खिलौने, नहीं सुनाती 
हमें सुखद परियों की बात!
ऐसी बड़ी न होऊँ मैं
तेरा स्‍नेह न खोऊँ मैं,
तेरे अंचल की छाया में
छिपी रहूँ निस्‍पृह, निर्भय,
कहूँ-दिखा दे चंद्रोदय!
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