3 सितंबर 2016


बह नहीं रहे होंगे

प्रेषक : धर्मेंद्र कुमार

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बह नहीं रहे होंगे
रेवा के किनारे-किनारे
उन दिनों के

हमारे शब्द
दीपों की तरह
पड़े तो होंगे मगर

पहुँच कर वे
अरब-सागर के किनारे पर
कंकरों और शंखो और
सीपों की तरह!
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