12 सितंबर 2016


नयनों की रेशम डोरी से

प्रेषक : धर्मेंद्र कुमार

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नयनों की रेशम डोरी से 
अपनी कोमल बरजोरी से। 

रहने दो इसको निर्जन में 
बांधो मत मधुमय बन्धन में, 
एकाकी ही है भला यहाँ, 
निठुराई की झकझोरी से। 

अन्तरतम तक तुम भेद रहे, 
प्राणों के कण कण छेद रहे। 
मत अपने मन में कसो मुझे 
इस ममता की गँठजोरी से। 

निष्ठुर न बनो मेरे चंचल 
रहने दो कोरा ही अंचल, 
मत अरूण करो हे तरूण किरण। 
अपनी करूणा की रोरी से।
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