2 सितंबर 2016


दर्द कभी-कभी

प्रेषक : धर्मेंद्र कुमार

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कभी-कभी फुरसत मिल जाती है दर्द को
कभी-कभी नज़र में आ जाता हूँ मैं उसके
तो कभी -कभी वक्त साधन बन जाता है उसका
जो ज़रिया बनकर आता है मुलाकात के लिए!

कोई बात भी होती अगर छिपा लेता मैं खुद को
कोई रास्ता भी होता अगर बचा लेता मैं खुद को
डर भी लगता, अगर सोचता मैं उसके लिए

कभी -कभी इन विषयो को भी सहायता करनी नहीं आती
कभी-कभी दर्द कुछ ऐसी वेशभूषा में चला आता है
जैसी कभी-कभी ख़ुशी की चादर ओढ़कर आता है
तो कभी-कभी कमबख्त सामने आते ही चेहरा दिखा देता है

कोई वजह भी होती अगर दर्द देने की 
कोई मर्ज़ भी होता अगर इस दर्द का
लेकिन कोई आधार भी तो कैसे ले इस दर्द को

कभी-कभी ऐसा भी लगता है इस दर्द को
जैसे किसी घने जंगल की तरफ रुख ले रहा है
तो कभी-कभी हमदर्द की कमी महसूस करता है 
कभी-कभी हमदर्द की भाषा तलाशने लगता है

लेकिन कोई गहरे समंदर में नहीं दिखाई पड़ता
देखना चाहू फिर भी सातव आसमान ही नज़र आता है
नज़ारो को देखकर ही लौट जाता हूँ मैं!

कभी-कभी जैसे गहरे समंदर की तरफ,
कभी-कभी जैसे मोती की तलाश में
कभी -कभी जैसी कविताये बनाने 
और ये कभी-कभी यू ही चलता रहेगा,
कभी-कभी से कभी तक।।।
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