7 सितंबर 2016


निराला रंग

प्रेषक : धर्मेंद्र कुमार

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बनें बनायें किन्तु बिगड़ती बात बनावें।
हँसें हँसावें किन्तु हँसी अपनी न करावें।
बहक बहँकते रहें पर न रुचि को बहँकावें।
खुल खेलें, पर खेल खोल आँखों को पावें।
भर जायँ उमंगों में मगर बेढंगी न उमंग हो।
रँगतें रहें सब रंग की मगर निराला रंग हो।
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