30 सितंबर 2016


मैंने लिखा कुछ भी नहीं

प्रेषक : धर्मेंद्र कुमार

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मैंने लिखा कुछ भी नहीं
तुम ने पढ़ा कुछ भी नहीं ।

जो भी लिखा दिल से लिखा
इस के सिवा कुछ भी नहीं ।

मुझ से ज़माना है ख़फ़ा
मेरी ख़ता कुछ भी नहीं ।

तुम तो खुदा के बन्दे हो
मेरा खुदा कुछ भी नहीं ।

मैं ने उस पर जान दी
उस को वफ़ा कुछ भी नहीं ।

चाहा तुम्हें यह अब कहूँ
लेकिन कहा कुछ भी नहीं ।

यह तो नज़र की बात है
अच्छा बुरा कुछ भी नहीं ।

12 सितंबर 2016


नयनों की रेशम डोरी से

प्रेषक : धर्मेंद्र कुमार

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नयनों की रेशम डोरी से 
अपनी कोमल बरजोरी से। 

रहने दो इसको निर्जन में 
बांधो मत मधुमय बन्धन में, 
एकाकी ही है भला यहाँ, 
निठुराई की झकझोरी से। 

अन्तरतम तक तुम भेद रहे, 
प्राणों के कण कण छेद रहे। 
मत अपने मन में कसो मुझे 
इस ममता की गँठजोरी से। 

निष्ठुर न बनो मेरे चंचल 
रहने दो कोरा ही अंचल, 
मत अरूण करो हे तरूण किरण। 
अपनी करूणा की रोरी से।

गिरिराज

प्रेषक : धर्मेंद्र कुमार

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यह है भारत का शुभ्र मुकुट 
यह है भारत का उच्च भाल, 
सामने अचल जो खड़ा हुआ 
हिमगिरि विशाल, गिरिवर विशाल! 

कितना उज्ज्वल, कितना शीतल 
कितना सुन्दर इसका स्वरूप? 
है चूम रहा गगनांगन को 
इसका उन्नत मस्तक अनूप! 

है मानसरोवर यहीं कहीं 
जिसमें मोती चुगते मराल, 
हैं यहीं कहीं कैलास शिखर 
जिसमें रहते शंकर कृपाल! 

युग युग से यह है अचल खड़ा 
बनकर स्वदेश का शुभ्र छत्र! 
इसके अँचल में बहती हैं 
गंगा सजकर नवफूल पत्र! 

इस जगती में जितने गिरि हैं 
सब झुक करते इसको प्रणाम, 
गिरिराज यही, नगराज यही 
जननी का गौरव गर्व–धाम! 

इस पार हमारा भारत है, 
उस पार चीन–जापान देश 
मध्यस्थ खड़ा है दोनों में 
एशिया खंड का यह नगेश!

खादी के धागे-धागे में

प्रेषक : धर्मेंद्र कुमार

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खादी के धागे-धागे में अपनेपन का अभिमान भरा,
माता का इसमें मान भरा, अन्यायी का अपमान भरा।

खादी के रेशे-रेशे में अपने भाई का प्यार भरा,
मां-बहनों का सत्कार भरा, बच्चों का मधुर दुलार भरा।

खादी की रजत चंद्रिका जब, आकर तन पर मुसकाती है,
जब नव-जीवन की नई ज्योति अंतस्थल में जग जाती है।

खादी से दीन निहत्थों की उत्तप्त उसांस निकलती है,
जिससे मानव क्या, पत्थर की भी छाती कड़ी पिघलती है।

खादी में कितने ही दलितों के दग्ध हृदय की दाह छिपी,
कितनों की कसक कराह छिपी, कितनों की आहत आह छिपी।

खादी में कितनी ही नंगों-भिखमंगों की है आस छिपी,
कितनों की इसमें भूख छिपी, कितनों की इसमें प्यास छिपी।

खादी तो कोई लड़ने का, है भड़कीला रणगान नहीं,
खादी है तीर-कमान नहीं, खादी है खड्ग-कृपाण नहीं।

खादी को देख-देख तो भी दुश्मन का दिल थहराता है,
खादी का झंडा सत्य, शुभ्र अब सभी ओर फहराता है।

खादी की गंगा जब सिर से पैरों तक बह लहराती है,
जीवन के कोने-कोने की, तब सब कालिख धुल जाती है।

खादी का ताज चांद-सा जब, मस्तक पर चमक दिखाता है,
कितने ही अत्याचार ग्रस्त दीनों के त्रास मिटाता है।

खादी ही भर-भर देश प्रेम का प्याला मधुर पिलाएगी,
खादी ही दे-दे संजीवन, मुर्दों को पुनः जिलाएगी।

खादी ही बढ़, चरणों पर पड़ नुपूर-सी लिपट मना लेगी,
खादी ही भारत से रूठी आज़ादी को घर लाएगी।

अलि रचो छंद

प्रेषक : धर्मेंद्र कुमार

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अलि रचो छंद
आज कण कण कनक कुंदन,
आज तृण तृण हरित चंदन,
आज क्षण क्षण चरण वंदन 
विनय अनुनय लालसा है। 
आज वासन्ती उषा है।

अलि रचो छंद 
आज आई मधुर बेला, 
अब करो मत निठुर खेला,
मिलन का हो मधुर मेला 
आज अथरों में तृषा है। 
आज वासंती उषा है।

अलि रचो छंद 
मधु के मधु ऋतु के सौरभ के, 
उल्लास भरे अवनी नभ के,
जडजीवन का हिम पिघल चले
हो स्वर्ण भरा प्रतिचरण मंद
अलि रचो छंद।

आया वसंत

प्रेषक : धर्मेंद्र कुमार

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आया वसंत आया वसंत
छाई जग में शोभा अनंत।

सरसों खेतों में उठी फूल
बौरें आमों में उठीं झूल
बेलों में फूले नये फूल

पल में पतझड़ का हुआ अंत
आया वसंत आया वसंत।

लेकर सुगंध बह रहा पवन
हरियाली छाई है बन बन,
सुंदर लगता है घर आँगन

है आज मधुर सब दिग दिगंत
आया वसंत आया वसंत।

भौरे गाते हैं नया गान,
कोकिला छेड़ती कुहू तान
हैं सब जीवों के सुखी प्राण,

इस सुख का हो अब नही अंत
घर-घर में छाये नित वसंत।

11 सितंबर 2016


बढ़े चलो, बढ़े चलो

प्रेषक : धर्मेंद्र कुमार

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न हाथ एक शस्त्र हो, 
न हाथ एक अस्त्र हो, 
न अन्न वीर वस्त्र हो, 
हटो नहीं, डरो नहीं, बढ़े चलो, बढ़े चलो । 

रहे समक्ष हिम-शिखर, 
तुम्हारा प्रण उठे निखर, 
भले ही जाए जन बिखर, 
रुको नहीं, झुको नहीं, बढ़े चलो, बढ़े चलो ।

घटा घिरी अटूट हो, 
अधर में कालकूट हो, 
वही सुधा का घूंट हो, 
जिये चलो, मरे चलो, बढ़े चलो, बढ़े चलो ।

गगन उगलता आग हो, 
छिड़ा मरण का राग हो,
लहू का अपने फाग हो, 
अड़ो वहीं, गड़ो वहीं, बढ़े चलो, बढ़े चलो ।

चलो नई मिसाल हो, 
जलो नई मिसाल हो,
बढो़ नया कमाल हो,
झुको नही, रूको नही, बढ़े चलो, बढ़े चलो ।

अशेष रक्त तोल दो, 
स्वतंत्रता का मोल दो, 
कड़ी युगों की खोल दो, 
डरो नही, मरो नहीं, बढ़े चलो, बढ़े चलो ।

नवल वर्ष

प्रेषक : धर्मेंद्र कुमार

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स्वागत! जीवन के नवल वर्ष 
आओ, नूतन-निर्माण लिये, 
इस महा जागरण के युग में 
जाग्रत जीवन अभिमान लिये; 

दीनों दुखियों का त्राण लिये 
मानवता का कल्याण लिये, 
स्वागत! नवयुग के नवल वर्ष! 
तुम आओ स्वर्ण-विहान लिये। 

संसार क्षितिज पर महाक्रान्ति 
की ज्वालाओं के गान लिये, 
मेरे भारत के लिये नई 
प्रेरणा नया उत्थान लिये; 

मुर्दा शरीर में नये प्राण 
प्राणों में नव अरमान लिये, 
स्वागत!स्वागत! मेरे आगत! 
तुम आओ स्वर्ण विहान लिये! 

युग-युग तक पिसते आये 
कृषकों को जीवन-दान लिये, 
कंकाल-मात्र रह गये शेष 
मजदूरों का नव त्राण लिये; 

श्रमिकों का नव संगठन लिये, 
पददलितों का उत्थान लिये; 
स्वागत!स्वागत! मेरे आगत! 
तुम आओ स्वर्ण विहान लिये! 

सत्ताधारी साम्राज्यवाद के 
मद का चिर-अवसान लिये, 
दुर्बल को अभयदान, 
भूखे को रोटी का सामान लिये; 

जीवन में नूतन क्रान्ति 
क्रान्ति में नये-नये बलिदान लिये, 
स्वागत! जीवन के नवल वर्ष 
आओ, तुम स्वर्ण विहान लिये!

जय राष्ट्रीय निशान!

प्रेषक : धर्मेंद्र कुमार

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जय राष्ट्रीय निशान! 
जय राष्ट्रीय निशान!!! 
लहर लहर तू मलय पवन में, 
फहर फहर तू नील गगन में, 
छहर छहर जग के आंगन में, 
सबसे उच्च महान! 
सबसे उच्च महान! 
जय राष्ट्रीय निशान!! 
जब तक एक रक्त कण तन में, 

डिगे न तिल भर अपने प्रण में,हाहाकार मचावें रण में, 
जननी की संतान 
जय राष्ट्रीय निशान! 
मस्तक पर शोभित हो रोली, 
बढे शुरवीरों की टोली, 
खेलें आज मरण की होली, 
बूढे और जवान 
बूढे और जवान! 
जय राष्ट्रीय निशान! 
मन में दीन-दुःखी की ममता, 
हममें हो मरने की क्षमता, 
मानव मानव में हो समता, 
धनी गरीब समान 
गूंजे नभ में तान 
जय राष्ट्रीय निशान! 
तेरा मेरा मेरुदंड हो कर में, 
स्वतन्त्रता के महासमर में, 
वज्र शक्ति बन व्यापे उस में, 
दे दें जीवन-प्राण! 
दे दें जीवन प्राण! 
जय राष्ट्रीय निशान!!

चल पड़े जिधर दो डग मग में

प्रेषक : धर्मेंद्र कुमार

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चल पड़े जिधर दो डग मग में 
चल पड़े कोटि पग उसी ओर,
पड़ गई जिधर भी एक दृष्टि 
गड़ गये कोटि दृग उसी ओर, 
जिसके शिर पर निज धरा हाथ
उसके शिर-रक्षक कोटि हाथ,
जिस पर निज मस्तक झुका दिया
झुक गये उसी पर कोटि माथ;
हे कोटिचरण, हे कोटिबाहु! 
हे कोटिरूप, हे कोटिनाम! 
तुम एकमूर्ति, प्रतिमूर्ति कोटि 
हे कोटिमूर्ति, तुमको प्रणाम! 
युग बढ़ा तुम्हारी हँसी देख
युग हटा तुम्हारी भृकुटि देख,
तुम अचल मेखला बन भू की
खींचते काल पर अमिट रेख;
तुम बोल उठे, युग बोल उठा, 
तुम मौन बने, युग मौन बना, 
कुछ कर्म तुम्हारे संचित कर 
युगकर्म जगा, युगधर्म तना; 
युग-परिवर्तक, युग-संस्थापक,
युग-संचालक, हे युगाधार!
युग-निर्माता, युग-मूर्ति! तुम्हें
युग-युग तक युग का नमस्कार!
तुम युग-युग की रूढ़ियाँ तोड़
रचते रहते नित नई सृष्टि, 
उठती नवजीवन की नींवें 
ले नवचेतन की दिव्य-दृष्टि; 
धर्माडंबर के खँडहर पर
कर पद-प्रहार, कर धराध्वस्त
मानवता का पावन मंदिर
निर्माण कर रहे सृजनव्यस्त!
बढ़ते ही जाते दिग्विजयी! 
गढ़ते तुम अपना रामराज, 
आत्माहुति के मणिमाणिक से 
मढ़ते जननी का स्वर्णताज! 
तुम कालचक्र के रक्त सने
दशनों को कर से पकड़ सुदृढ़,
मानव को दानव के मुँह से
ला रहे खींच बाहर बढ़ बढ़;
पिसती कराहती जगती के 
प्राणों में भरते अभय दान, 
अधमरे देखते हैं तुमको, 
किसने आकर यह किया त्राण? 
दृढ़ चरण, सुदृढ़ करसंपुट से
तुम कालचक्र की चाल रोक,
नित महाकाल की छाती पर
लिखते करुणा के पुण्य श्लोक!
कँपता असत्य, कँपती मिथ्या, 
बर्बरता कँपती है थरथर! 
कँपते सिंहासन, राजमुकुट 
कँपते, खिसके आते भू पर, 
हैं अस्त्र-शस्त्र कुंठित लुंठित,
सेनायें करती गृह-प्रयाण!
रणभेरी तेरी बजती है,
उड़ता है तेरा ध्वज निशान!
हे युग-दृष्टा, हे युग-स्रष्टा, 
पढ़ते कैसा यह मोक्ष-मंत्र? 
इस राजतंत्र के खँडहर में 
उगता अभिनव भारत स्वतंत्र!

जगमग जगमग

प्रेषक : धर्मेंद्र कुमार

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हर घर, हर दर, बाहर, भीतर,
नीचे ऊपर, हर जगह सुघर,
कैसी उजियाली है पग-पग?
जगमग जगमग जगमग जगमग!

छज्जों में, छत में, आले में,
तुलसी के नन्हें थाले में,
यह कौन रहा है दृग को ठग?
जगमग जगमग जगमग जगमग!

पर्वत में, नदियों, नहरों में,
प्यारी प्यारी सी लहरों में,
तैरते दीप कैसे भग-भग!
जगमग जगमग जगमग जगमग!

राजा के घर, कंगले के घर,
हैं वही दीप सुंदर सुंदर!
दीवाली की श्री है पग-पग,
जगमग जगमग जगमग जगमग!

पूजा-गीत

प्रेषक : धर्मेंद्र कुमार

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वंदना के इन स्वरों में एक स्वर मेरा मिला लो।
राग में जब मत्त झूलो
तो कभी माँ को न भूलो,
अर्चना के रत्नकण में एक कण मेरा मिला लो।
जब हृदय का तार बोले,
शृंखला के बंद खोले;
हों जहाँ बलि शीश अगणित, एक शिर मेरा मिला लो।

कोशिश करने वालों की हार नहीं होती

प्रेषक : धर्मेंद्र कुमार

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लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती

नन्हीं चींटी जब दाना लेकर चलती है
चढ़ती दीवारों पर, सौ बार फिसलती है
मन का विश्वास रगों में साहस भरता है
चढ़कर गिरना, गिरकर चढ़ना न अखरता है
आख़िर उसकी मेहनत बेकार नहीं होती
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती

डुबकियां सिंधु में गोताखोर लगाता है
जा जा कर खाली हाथ लौटकर आता है
मिलते नहीं सहज ही मोती गहरे पानी में
बढ़ता दुगना उत्साह इसी हैरानी में
मुट्ठी उसकी खाली हर बार नहीं होती
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती

असफलता एक चुनौती है, स्वीकार करो
क्या कमी रह गई, देखो और सुधार करो
जब तक न सफल हो, नींद चैन को त्यागो तुम
संघर्ष का मैदान छोड़ मत भागो तुम
कुछ किये बिना ही जय जय कार नहीं होती
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती

10 सितंबर 2016


मधुमय प्याली

प्रेषक : धर्मेंद्र कुमार

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रीती होती जाती थी 
जीवन की मधुमय प्याली।
फीकी पड़ती जाती थी 
मेरे यौवन की लाली।।

हँस-हँस कर यहाँ निराशा
थी अपने खेल दिखाती।
धुंधली रेखा आशा की 
पैरों से मसल मिटाती।।

युग-युग-सी बीत रही थीं 
मेरे जीवन की घड़ियाँ।
सुलझाये नहीं सुलझती 
उलझे भावों की लड़ियाँ।

जाने इस समय कहाँ से 
ये चुपके-चुपके आए।
सब रोम-रोम में मेरे 
ये बन कर प्राण समाए।

मैं उन्हें भूलने जाती 
ये पलकों में छिपे रहते।
मैं दूर भागती उनसे 
ये छाया बन कर रहते।

विधु के प्रकाश में जैसे 
तारावलियाँ घुल जातीं।
वालारुण की आभा से 
अगणित कलियाँ खुल जातीं।।

आओ हम उसी तरह से 
सब भेद भूल कर अपना।
मिल जाएँ मधु बरसायें 
जीवन दो दिन का सपना।।

फिर छलक उठी है मेरे 
जीवन की मधुमय प्याली।
आलोक प्राप्त कर उनका 
चमकी यौवन की लाली।।

झिलमिल तारे

प्रेषक : धर्मेंद्र कुमार

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कर रहे प्रतीक्षा किसकी हैं 
झिलमिल-झिलमिल तारे?
धीमे प्रकाश में कैसे तुम 
चमक रहे मन मारे।। 

अपलक आँखों से कह दो 
किस ओर निहारा करते?
किस प्रेयसि पर तुम अपनी 
मुक्तावलि वारा करते? 

करते हो अमिट प्रतीक्षा, 
तुम कभी न विचलित होते।
नीरव रजनी अंचल में 
तुम कभी न छिप कर सोते।। 

जब निशा प्रिया से मिलने, 
दिनकर निवेश में जाते।
नभ के सूने आँगन में 
तुम धीरे-धीरे आते।।

विधुरा से कह दो मन की, 
लज्जा की जाली खोलो।
क्या तुम भी विरह विकल हो, 
हे तारे कुछ तो बोलो।

मैं भी वियोगिनी मुझसे 
फिर कैसी लज्जा प्यारे?
कह दो अपनी बीती को 
हे झिलमिल-झिलमिल तारे!

शैशव के सुन्दर प्रभात का

प्रेषक : धर्मेंद्र कुमार

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शैशव के सुन्दर प्रभात का
मैंने नव विकास देखा।
यौवन की मादक लाली में
जीवन का हुलास देखा।।

जग-झंझा-झकोर में
आशा-लतिका का विलास देखा।
आकांक्षा, उत्साह, प्रेम का
क्रम-क्रम से प्रकाश देखा।।

जीवन में न निराशा मुझको
कभी रुलाने को आयी।
जग झूठा है यह विरक्ति भी
नहीं सिखाने को आयी।।

अरिदल की पहिचान कराने
नहीं घृणा आने पायी।
नहीं अशान्ति हृदय तक अपनी
भीषणता लाने पायी।।

खिलौनेवाला

प्रेषक : धर्मेंद्र कुमार

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वह देखो माँ आज
खिलौनेवाला फिर से आया है।
कई तरह के सुंदर-सुंदर
नए खिलौने लाया है।

हरा-हरा तोता पिंजड़े में
गेंद एक पैसे वाली
छोटी सी मोटर गाड़ी है
सर-सर-सर चलने वाली।

सीटी भी है कई तरह की
कई तरह के सुंदर खेल
चाभी भर देने से भक-भक
करती चलने वाली रेल।

गुड़िया भी है बहुत भली-सी
पहने कानों में बाली
छोटा-सा 'टी सेट' है
छोटे-छोटे हैं लोटा थाली।

छोटे-छोटे धनुष-बाण हैं
हैं छोटी-छोटी तलवार
नए खिलौने ले लो भैया
ज़ोर-ज़ोर वह रहा पुकार।

मुन्‍नू ने गुड़िया ले ली है
मोहन ने मोटर गाड़ी
मचल-मचल सरला करती है
माँ ने लेने को साड़ी

कभी खिलौनेवाला भी माँ
क्‍या साड़ी ले आता है।
साड़ी तो वह कपड़े वाला
कभी-कभी दे जाता है

अम्‍मा तुमने तो लाकर के
मुझे दे दिए पैसे चार
कौन खिलौने लेता हूँ मैं
तुम भी मन में करो विचार।

तुम सोचोगी मैं ले लूँगा।
तोता, बिल्‍ली, मोटर, रेल
पर माँ, यह मैं कभी न लूँगा
ये तो हैं बच्‍चों के खेल।

मैं तो तलवार खरीदूँगा माँ
या मैं लूँगा तीर-कमान
जंगल में जा, किसी ताड़का
को मारुँगा राम समान।

तपसी यज्ञ करेंगे, असुरों-
को मैं मार भगाऊँगा
यों ही कुछ दिन करते-करते 
रामचंद्र मैं बन जाऊँगा।

यही रहूँगा कौशल्‍या मैं
तुमको यही बनाऊँगा।
तुम कह दोगी वन जाने को
हँसते-हँसते जाऊँगा।

पर माँ, बिना तुम्‍हारे वन में
मैं कैसे रह पाऊँगा।
दिन भर घूमूँगा जंगल में
लौट कहाँ पर आऊँगा।

किससे लूँगा पैसे, रूठूँगा
तो कौन मना लेगा
कौन प्‍यार से बिठा गोद में
मनचाही चींजे़ देगा।

वीरों का कैसा हो वसंत

प्रेषक : धर्मेंद्र कुमार

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आ रही हिमालय से पुकार
है उदधि गरजता बार बार
प्राची पश्चिम भू नभ अपार;
सब पूछ रहें हैं दिग-दिगन्त
वीरों का कैसा हो वसंत

फूली सरसों ने दिया रंग
मधु लेकर आ पहुंचा अनंग
वधु वसुधा पुलकित अंग अंग;
है वीर देश में किन्तु कंत
वीरों का कैसा हो वसंत

भर रही कोकिला इधर तान
मारू बाजे पर उधर गान
है रंग और रण का विधान;
मिलने को आए आदि अंत
वीरों का कैसा हो वसंत

गलबाहें हों या कृपाण
चलचितवन हो या धनुषबाण
हो रसविलास या दलितत्राण;
अब यही समस्या है दुरंत
वीरों का कैसा हो वसंत

कह दे अतीत अब मौन त्याग
लंके तुझमें क्यों लगी आग
ऐ कुरुक्षेत्र अब जाग जाग;
बतला अपने अनुभव अनंत
वीरों का कैसा हो वसंत

हल्दीघाटी के शिला खण्ड
ऐ दुर्ग सिंहगढ़ के प्रचंड
राणा ताना का कर घमंड;
दो जगा आज स्मृतियां ज्वलंत
वीरों का कैसा हो वसंत

भूषण अथवा कवि चंद नहीं
बिजली भर दे वह छन्द नहीं
है कलम बंधी स्वच्छंद नहीं;
फिर हमें बताए कौन हन्त
वीरों का कैसा हो वसंत

पानी और धूप

प्रेषक : धर्मेंद्र कुमार

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अभी अभी थी धूप, बरसने
लगा कहाँ से यह पानी
किसने फोड़ घड़े बादल के
की है इतनी शैतानी।

सूरज ने क्‍यों बंद कर लिया
अपने घर का दरवाजा़
उसकी माँ ने भी क्‍या उसको
बुला लिया कहकर आजा।

ज़ोर-ज़ोर से गरज रहे हैं
बादल हैं किसके काका
किसको डाँट रहे हैं, किसने
कहना नहीं सुना माँ का।

बिजली के आँगन में अम्‍माँ
चलती है कितनी तलवार
कैसी चमक रही है फिर भी
क्‍यों खाली जाते हैं वार।

क्‍या अब तक तलवार चलाना
माँ वे सीख नहीं पाए
इसीलिए क्‍या आज सीखने
आसमान पर हैं आए।

एक बार भी माँ यदि मुझको
बिजली के घर जाने दो
उसके बच्‍चों को तलवार
चलाना सिखला आने दो।

खुश होकर तब बिजली देगी
मुझे चमकती सी तलवार
तब माँ कर न कोई सकेगा
अपने ऊपर अत्‍याचार।

पुलिसमैन अपने काका को
फिर न पकड़ने आएँगे
देखेंगे तलवार दूर से ही
वे सब डर जाएँगे।

अगर चाहती हो माँ काका
जाएँ अब न जेलखाना
तो फिर बिजली के घर मुझको
तुम जल्‍दी से पहुँचाना।

काका जेल न जाएँगे अब
तूझे मँगा दूँगी तलवार
पर बिजली के घर जाने का
अब मत करना कभी विचार।

9 सितंबर 2016


कोयल

प्रेषक : धर्मेंद्र कुमार

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देखो कोयल काली है पर
मीठी है इसकी बोली
इसने ही तो कूक कूक कर
आमों में मिश्री घोली

कोयल कोयल सच बतलाना
क्या संदेसा लायी हो
बहुत दिनों के बाद आज फिर
इस डाली पर आई हो

क्या गाती हो किसे बुलाती
बतला दो कोयल रानी
प्यासी धरती देख मांगती
हो क्या मेघों से पानी?

कोयल यह मिठास क्या तुमने
अपनी माँ से पायी है?
माँ ने ही क्या तुमको मीठी
बोली यह सिखलायी है?

डाल डाल पर उड़ना गाना
जिसने तुम्हें सिखाया है
सबसे मीठे मीठे बोलो
यह भी तुम्हें बताया है

बहुत भली हो तुमने माँ की
बात सदा ही है मानी
इसीलिये तो तुम कहलाती
हो सब चिड़ियों की रानी

ठुकरा दो या प्यार करो

प्रेषक : धर्मेंद्र कुमार

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देव! तुम्हारे कई उपासक कई ढंग से आते हैं 
सेवा में बहुमूल्य भेंट वे कई रंग की लाते हैं 

धूमधाम से साज-बाज से वे मंदिर में आते हैं 
मुक्तामणि बहुमुल्य वस्तुऐं लाकर तुम्हें चढ़ाते हैं 

मैं ही हूँ गरीबिनी ऐसी जो कुछ साथ नहीं लायी 
फिर भी साहस कर मंदिर में पूजा करने चली आयी 

धूप-दीप-नैवेद्य नहीं है झांकी का श्रृंगार नहीं 
हाय! गले में पहनाने को फूलों का भी हार नहीं 

कैसे करूँ कीर्तन, मेरे स्वर में है माधुर्य नहीं 
मन का भाव प्रकट करने को वाणी में चातुर्य नहीं 

नहीं दान है, नहीं दक्षिणा खाली हाथ चली आयी 
पूजा की विधि नहीं जानती, फिर भी नाथ चली आयी 

पूजा और पुजापा प्रभुवर इसी पुजारिन को समझो 
दान-दक्षिणा और निछावर इसी भिखारिन को समझो 

मैं उनमत्त प्रेम की प्यासी हृदय दिखाने आयी हूँ 
जो कुछ है, वह यही पास है, इसे चढ़ाने आयी हूँ 

चरणों पर अर्पित है, इसको चाहो तो स्वीकार करो 
यह तो वस्तु तुम्हारी ही है ठुकरा दो या प्यार करो

यह कदंब का पेड़

प्रेषक : धर्मेंद्र कुमार

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यह कदंब का पेड़ अगर माँ होता यमुना तीरे। 
मैं भी उस पर बैठ कन्हैया बनता धीरे-धीरे॥ 

ले देतीं यदि मुझे बांसुरी तुम दो पैसे वाली। 
किसी तरह नीची हो जाती यह कदंब की डाली॥ 

तुम्हें नहीं कुछ कहता पर मैं चुपके-चुपके आता। 
उस नीची डाली से अम्मा ऊँचे पर चढ़ जाता॥ 

वहीं बैठ फिर बड़े मजे से मैं बांसुरी बजाता। 
अम्मा-अम्मा कह वंशी के स्वर में तुम्हे बुलाता॥ 

बहुत बुलाने पर भी माँ जब नहीं उतर कर आता। 
माँ, तब माँ का हृदय तुम्हारा बहुत विकल हो जाता॥ 

तुम आँचल फैला कर अम्मां वहीं पेड़ के नीचे। 
ईश्वर से कुछ विनती करतीं बैठी आँखें मीचे॥ 

तुम्हें ध्यान में लगी देख मैं धीरे-धीरे आता। 
और तुम्हारे फैले आँचल के नीचे छिप जाता॥ 

तुम घबरा कर आँख खोलतीं, पर माँ खुश हो जाती। 
जब अपने मुन्ना राजा को गोदी में ही पातीं॥ 

इसी तरह कुछ खेला करते हम-तुम धीरे-धीरे। 
यह कदंब का पेड़ अगर माँ होता यमुना तीरे॥

मृदुल कल्पना के चल पँखों पर

प्रेषक : धर्मेंद्र कुमार

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मृदुल कल्पना के चल पँखों पर हम तुम दोनों आसीन। 
भूल जगत के कोलाहल को रच लें अपनी सृष्टि नवीन।। 

वितत विजन के शांत प्रांत में कल्लोलिनी नदी के तीर। 
बनी हुई हो वहीं कहीं पर हम दोनों की पर्ण-कुटीर।। 

कुछ रूखा, सूखा खाकर ही पीतें हों सरिता का जल। 
पर न कुटिल आक्षेप जगत के करने आवें हमें विकल।। 

सरल काव्य-सा सुंदर जीवन हम सानंद बिताते हों। 
तरु-दल की शीतल छाया में चल समीर-सा गाते हों।। 

सरिता के नीरव प्रवाह-सा बढ़ता हो अपना जीवन। 
हो उसकी प्रत्येक लहर में अपना एक निरालापन।। 

रचे रुचिर रचनाएँ जग में अमर प्राण भरने वाली। 
दिशि-दिशि को अपनी लाली से अनुरंजित करने वाली।। 

तुम कविता के प्राण बनो मैं उन प्राणों की आकुल तान। 
निर्जन वन को मुखरित कर दे प्रिय! अपना सम्मोहन गान।।

जलियाँवाला बाग में बसंत

प्रेषक : धर्मेंद्र कुमार

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यहाँ कोकिला नहीं, काग हैं, शोर मचाते, 
काले काले कीट, भ्रमर का भ्रम उपजाते। 

कलियाँ भी अधखिली, मिली हैं कंटक-कुल से, 
वे पौधे, व पुष्प शुष्क हैं अथवा झुलसे। 

परिमल-हीन पराग दाग सा बना पड़ा है, 
हा! यह प्यारा बाग खून से सना पड़ा है। 

ओ, प्रिय ऋतुराज! किन्तु धीरे से आना, 
यह है शोक-स्थान यहाँ मत शोर मचाना। 

वायु चले, पर मंद चाल से उसे चलाना, 
दुःख की आहें संग उड़ा कर मत ले जाना। 

कोकिल गावें, किन्तु राग रोने का गावें, 
भ्रमर करें गुंजार कष्ट की कथा सुनावें। 

लाना संग में पुष्प, न हों वे अधिक सजीले, 
तो सुगंध भी मंद, ओस से कुछ कुछ गीले। 

किन्तु न तुम उपहार भाव आ कर दिखलाना, 
स्मृति में पूजा हेतु यहाँ थोड़े बिखराना। 

कोमल बालक मरे यहाँ गोली खा कर, 
कलियाँ उनके लिये गिराना थोड़ी ला कर। 

आशाओं से भरे हृदय भी छिन्न हुए हैं, 
अपने प्रिय परिवार देश से भिन्न हुए हैं। 

कुछ कलियाँ अधखिली यहाँ इसलिए चढ़ाना, 
कर के उनकी याद अश्रु के ओस बहाना। 

तड़प तड़प कर वृद्ध मरे हैं गोली खा कर, 
शुष्क पुष्प कुछ वहाँ गिरा देना तुम जा कर। 

यह सब करना, किन्तु यहाँ मत शोर मचाना, 
यह है शोक-स्थान बहुत धीरे से आना।

मेरा नया बचपन

प्रेषक : धर्मेंद्र कुमार

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बार-बार आती है मुझको मधुर याद बचपन तेरी। 
गया ले गया तू जीवन की सबसे मस्त खुशी मेरी॥ 

चिंता-रहित खेलना-खाना वह फिरना निर्भय स्वच्छंद। 
कैसे भूला जा सकता है बचपन का अतुलित आनंद? 

ऊँच-नीच का ज्ञान नहीं था छुआछूत किसने जानी? 
बनी हुई थी वहाँ झोंपड़ी और चीथड़ों में रानी॥ 

किये दूध के कुल्ले मैंने चूस अँगूठा सुधा पिया। 
किलकारी किल्लोल मचाकर सूना घर आबाद किया॥ 

रोना और मचल जाना भी क्या आनंद दिखाते थे। 
बड़े-बड़े मोती-से आँसू जयमाला पहनाते थे॥ 

मैं रोई, माँ काम छोड़कर आईं, मुझको उठा लिया। 
झाड़-पोंछ कर चूम-चूम कर गीले गालों को सुखा दिया॥ 

दादा ने चंदा दिखलाया नेत्र नीर-युत दमक उठे। 
धुली हुई मुस्कान देख कर सबके चेहरे चमक उठे॥ 

वह सुख का साम्राज्य छोड़कर मैं मतवाली बड़ी हुई। 
लुटी हुई, कुछ ठगी हुई-सी दौड़ द्वार पर खड़ी हुई॥ 

लाजभरी आँखें थीं मेरी मन में उमँग रँगीली थी। 
तान रसीली थी कानों में चंचल छैल छबीली थी॥ 

दिल में एक चुभन-सी थी यह दुनिया अलबेली थी। 
मन में एक पहेली थी मैं सब के बीच अकेली थी॥ 

मिला, खोजती थी जिसको हे बचपन! ठगा दिया तूने। 
अरे! जवानी के फंदे में मुझको फँसा दिया तूने॥ 

सब गलियाँ उसकी भी देखीं उसकी खुशियाँ न्यारी हैं। 
प्यारी, प्रीतम की रँग-रलियों की स्मृतियाँ भी प्यारी हैं॥ 

माना मैंने युवा-काल का जीवन खूब निराला है। 
आकांक्षा, पुरुषार्थ, ज्ञान का उदय मोहनेवाला है॥ 

किंतु यहाँ झंझट है भारी युद्ध-क्षेत्र संसार बना। 
चिंता के चक्कर में पड़कर जीवन भी है भार बना॥ 

आ जा बचपन! एक बार फिर दे दे अपनी निर्मल शांति। 
व्याकुल व्यथा मिटानेवाली वह अपनी प्राकृत विश्रांति॥ 

वह भोली-सी मधुर सरलता वह प्यारा जीवन निष्पाप। 
क्या आकर फिर मिटा सकेगा तू मेरे मन का संताप? 

मैं बचपन को बुला रही थी बोल उठी बिटिया मेरी। 
नंदन वन-सी फूल उठी यह छोटी-सी कुटिया मेरी॥ 

'माँ ओ' कहकर बुला रही थी मिट्टी खाकर आयी थी। 
कुछ मुँह में कुछ लिये हाथ में मुझे खिलाने लायी थी॥ 

पुलक रहे थे अंग, दृगों में कौतुहल था छलक रहा। 
मुँह पर थी आह्लाद-लालिमा विजय-गर्व था झलक रहा॥ 

मैंने पूछा 'यह क्या लायी?' बोल उठी वह 'माँ, काओ'। 
हुआ प्रफुल्लित हृदय खुशी से मैंने कहा - 'तुम्हीं खाओ'॥ 

पाया मैंने बचपन फिर से बचपन बेटी बन आया। 
उसकी मंजुल मूर्ति देखकर मुझ में नवजीवन आया॥ 

मैं भी उसके साथ खेलती खाती हूँ, तुतलाती हूँ। 
मिलकर उसके साथ स्वयं मैं भी बच्ची बन जाती हूँ॥ 

जिसे खोजती थी बरसों से अब जाकर उसको पाया। 
भाग गया था मुझे छोड़कर वह बचपन फिर से आया॥
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