14 दिसंबर 2016


हम को जुनूँ क्या सिखलाते हो

प्रेषक : धर्मेंद्र कुमार

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हम को जुनूँ क्या सिखलाते हो हम थे परेशाँ तुमसे ज़ियादा 
चाक किये हैं हमने अज़ीज़ों चार गरेबाँ तुमसे ज़ियादा 

चाक-ए-जिगर मुहताज-ए-रफ़ू है आज तो दामन सिर्फ़ लहू है 
एक मौसम था हम को रहा है शौक़-ए-बहाराँ तुमसे ज़ियादा 

जाओ तुम अपनी बाम की ख़ातिर सारी लवें शमों की कतर लो 
ज़ख़्मों के महर-ओ-माह सलामत जश्न-ए-चिराग़ाँ तुमसे ज़ियादा 

हम भी हमेशा क़त्ल हुए अन्द तुम ने भी देखा दूर से लेकिन 
ये न समझे हमको हुआ है जान का नुकसाँ तुमसे ज़ियादा 

ज़ंजीर-ओ-दीवार ही देखी तुमने तो "मजरूह" मगर हम 
कूचा-कूचा देख रहे हैं आलम-ए-ज़िंदाँ तुमसे ज़ियादा 

13 दिसंबर 2016


घर-धाम

प्रेषक : धर्मेंद्र कुमार

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मैं अब हो गया हूँ निढाल
अर्थहीन कार्यों में
नष्ट कर दिए
मैंने
       साल-पर-साल
             न जाने कितने साल!
             - और अब भी
             मैं नहीं जान पाया
                  है कहाँ मेरा योग?

मैं अब घर जाना चाहता हूँ
मैं जंगलों
पहाड़ों में
       खो जाना चाहता हूँ
             मैं महुए के
                   वन में

       एक कंडे सा
       सुलगना, गुँगुवाना
       धुँधुवाना
       चाहता हूँ।

मैं जीना चाहता हूँ
और जीवन को
       भासमान
       करना चाहता हूँ।
मैं कपास धुनना चाहता हूँ
या
फावड़ा उठाना
       चाहता हूँ
       या
       गारे पर ईंटें
       बिठाना
            चाहता हूँ
            या पत्थरी नदी के एक ढोंके पर
                  जाकर
                      बैठ जाना
                            चाहता हूँ
मैं जंगलों के साथ
       सुगबुगाना चाहता हूँ
       और शहरों के साथ
             चिलचिलाना
                   चाहता हूँ

      मैं अब घर जाना चाहता हूँ

मैं विवाह करना चाहता हूँ
और
   उसे प्यार
      करना चाहता हूँ
        मैं उसका पति
          उसका प्रेमी
            और
              उसका सर्वस्व
                उसे देना चाहता हूँ
                     और
                       उसकी गोद
                        भरना चाहता हूँ।

मैं अपने आसपास
   अपना एक लोक
     रचना चाहता हूँ।
       मैं उसका पति, उसका प्रेमी
          और
          उसका सर्वस्व
           उसे देना चाहता हूँ
            और
              पठार
                ओढ़ लेना
                  चाहता हूँ।
मैं समूचा आकाश
   इस भुजा पर
      ताबीज की तरह
        बाँध
         लेना चाहता हूँ।
मैं महुए के बन में
     एक कंडे-सा
       सुलगना, गुँगुवाना
          धुँधुवाना चाहता हूँ।
            मैं अब घर
             जाना चाहता हूँ।

काशी में शव

प्रेषक : धर्मेंद्र कुमार

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तुमने देखी है काशी?
जहाँ, जिस रास्ते
जाता है शव -
उसी रास्ते
आता है शव!

शवों का क्या
शव आएँगे,
शव जाएँगे -

पूछो तो, किसका है यह शव?
रोहिताश्व का?
नहीं, नहीं,
हर शव रोहिताश्व नहीं हो सकता

जो होगा
दूर से पहचाना जाएगा
दूर से नहीं, तो
पास से -
और अगर पास से भी नहीं,
तो वह
रोहिताश्व नहीं हो सकता
और अगर हो भी तो
क्या फर्क पड़ेगा?

मित्रो,
तुमने तो देखी है काशी,
जहाँ, जिस रास्ते
जाता है शव
उसी रास्ते
आता है शव!
तुमने सिर्फ यही तो किया
रास्ता दिया
और पूछा -
किसका है यह शव?

जिस किसी का था,
और किसका नहीं था,
कोई फर्क पड़ा ?

काशी का न्याय

प्रेषक : धर्मेंद्र कुमार

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सभा बरखास्त हो चुकी
सभासद चलें

जो होना था सो हुआ
अब हम, मुँह क्यों लटकाए हुए हैं?
क्या कशमकश है?
किससे डर रहे हैं?

फैसला हमने नहीं लिया -
सिर हिलाने का मतलब फैसला लेना नहीं होता
हमने तो सोच-विचार तक नहीं किया

बहसियों ने बहस की
हमने क्या किया?

हमारा क्या दोष?
न हम सभा बुलाते हैं
न फैसला सुनाते हैं
वर्ष में एक बार
काशी आते हैं -
सिर्फ यह कहने के लिए
कि सभा बुलाने की भी आवश्यकता नहीं
हर व्यक्ति का फैसला
जन्म के पहले हो चुका है।

एक और ढंग

प्रेषक : धर्मेंद्र कुमार

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भागकर अकेलेपन से अपने
  तुममें मैं गया।
    सुविधा के कई वर्ष
     तुमने व्यतीत किए।
         कैसे?
           कुछ स्मरण नहीं।

 मैं और तुम! अपनी दिनचर्या के
         पृष्ठ पर
            अंकित थे
              एक संयुक्ताक्षर!

क्या कहूँ! लिपि को नियति
    केवल लिपि की नियति
       थी -
         तुममें से होकर भी,
            बसकर भी
           संग-संग रहकर भी
                 बिलकुल असंग हूँ।

सच है तुम्हारे बिना जीवन अपंग है
      - लेकिन! क्यों लगता है मुझे
             प्रेम
               अकेले होने का ही
                   एक और ढंग है।

भद्रवंश के प्रेत

प्रेषक : धर्मेंद्र कुमार

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छज्जों और आईनों, ट्रेनों और दूरबीन
कारों और पुस्तकों
यानी सुविधाओं के अद्वितीय चश्मों से
मुझे देखने वाले
अपमानित नगरों में सम्मानित नागरिकों
मुझे ध्यान से देखो
जेबी झिल्लियाँ सब उतार
मुझे नंगी आँखों देखो
पहिचानो।

मैं इस इतिहास के अँधेरे में, एक सड़ी और
फूली लाश सा
घिसटने वाला प्राणी कौन हूँ
ओ विपन्न सदियों के प्रभुजन, सम्पन्न जन।
मुझको पहिचानो
कुबडे, बूढे, कोढी, दैत्य सा तुम्हारे
हॉलो, शेल्फों, ड्रायर या ड्रेसिंग टेबल में
छिपने वाला प्राणी मैं कौन हूँ
पहिचानो, मुझको पहिचानो।

मेरी इस कूबड़ को जरा पास से देखो
मेरी गिलगिली पिलपिली बाँहें अपनें
दास्तानों से परे
अँगुलियों से महसूस करो
शायद तुमने इनको ग्रीवा के गिर्द कभी
पुष्प के धनुष सा भेंटा हो।

मुझसे मत बिचको
मुझे, घृणा की सिकुड़ी आँखों मत देखो
मुझसे मत भागो।
मेरे सिकुड़े टेढे ओठों पर ओठ रखो।
शायद तुमने इनमे कभी
किसी का
पूरा माँसल अस्तित्व कहीं भोगा होगा।
मेरी बह रही लार पर मत घिन लाओ
यह तुम हो
जो मुझसे हो कर गुजरे थे।
मेरी गल रही अंगुलियाँ देखो
पहचानो।
क्या मेरे सारे हस्ताक्षर धुंधला गये?
क्यों तुम मुझसे हरदम कटते हो?
क्यों मैं तुम्हारे सपनों में आ धमकता हूँ?
क्यों मैं तुम्हारे बच्चों को नहीं दिखता?
तुमको ही दिखता हूँ
जाओ
अपने बच्चों से पूछो।

ऊब

प्रेषक : धर्मेंद्र कुमार

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स्वेद में डूबे हुए सब जन्म पर पछता रहे हैं
पालने में शिशु।
चौंक या खिसिया रहे या पेड़ पर फन्दा लगा कर
आत्महत्या कर रहे हैं
शहर के मैदान।

उमस में डूबे हुए हैं घर सबेरा
घोंसले और घास
आ रहा या जा रहा है बक रहा या झक रहा है
निरर्थक कोई किसी के पास। 
मृत्युधर्मी प्रेम अथवा प्रेमधर्मी मृत्यु;
अकारण चुम्बन तड़ातड़
अकारण सहवास।
हारकर सब लड़ रहे हैं
हारकर सब पूर्वजों से
झगड़ते पत्तों सरीखे झर रहे हैं
घूम कर प्रत्येक छत पर
उतर आया शहर का आकाश
हर दिवस मौसम बदलने की प्रतीक्षा कर रहे हैं
हर घड़ी दुनिया बदलने की प्रतीक्षा कर रहे हैं।
भाग कर त्यौहार में
हैं युद्ध की तैयारियों में व्यस्त
एक दुनियाँ से निकल कर दूसरी में जा रहे हैं
युद्ध, चुम्बन, पालने ले।
स्वेद में डूबे हुए सब जन्म पर पछता रहे हैं।

महामहिम!

प्रेषक : धर्मेंद्र कुमार

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महामहिम!
चोर दरवाज़े से निकल चलिए !
बाहर
हत्यारे हैं !

बहुक़्म आप
खोल दिए मैनें
जेल के दरवाज़े,
तोड़ दिया था
करोड़ वर्षों का सन्नाटा

महामहिम !
डरिए ! निकल चलिए !
किसी की आँखों में 
हया नहीं
ईश्वर का भय नहीं
कोई नहीं कहेगा
"धन्यवाद" !

सब के हाथों में
कानून की किताब है
हाथ हिला पूछते हैं,
किसने लिखी थी
यह कानून की किताब ?

आस्था की प्रतिध्वनियां

प्रेषक : धर्मेंद्र कुमार

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जीवन का तीर्थ बनी जीवन की आस्था।
आंसू के कलश लिए
हम तुम तक आती हैं।
हम तेरी पुत्री हैं, तेरी प्रतिध्वनियां हैं।
अपने अनागत को
हम यम के पाशों से वापस ले आने को आतुर हैं।
जीवन का तीर्थ बनी ओ मन की आस्था!
अंधकार में हमने जन्म लिया
और बढी,
रुइयों-सी हम, दैनिक द्वंद्वों में धुनी गईं।
कष्टों में बटी गईं,
सिसकी बन सुनी गईं,
हम सब विद्रोहिणियां कारा में चुनी गईं।
लेकिन कारा हमको
रोक नहीं सकती है,
रोक नहीं सकती है,
रोक नहीं सकती है!
जन-जन का तीर्थ बनी ओ जन की आस्था!

मीरा-सी जहर पिए
हम तुझ तक आती हैं।
हम सब सरिताएं हैं।
समय की धमनियां हैं,
समय की शिराएं हैं।
समय का हृदय हमको चिर-जीवित रखना है।
इसीलिए हम इतनी तेजी से दौड रहीं,
रथ अपने मोड रहीं,
पथ पिछले छोड रहीं,
परम्परा तोड रहीं।

लौ बनकर हम युग के कुहरे को दाग रहीं।
सन्नाटे में ध्वनियां बनकर हम जाग रहीं।
जीवन का तीर्थ बनी, जीवन की आस्था।

टूटी पडी है परम्परा

प्रेषक : धर्मेंद्र कुमार

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टूटी पडी है परम्परा
शिव के धनुष-सी रखी रही परम्परा
कितने निपुण आए-गए
धनुर्धारी।
कौन इसे बौहे? और कौन इसे
कानों तक खींचे?
एक प्रश्नचिह्न-सी पडी रही परम्परा।
मैं सबमें छोटा और सबसे अल्पायु-
मैं भविष्यवासी।
मैंने छुआ ही था, जीवित हो उठी।
मैंने जो प्रत्यंचा खींची
तो टूट गई परम्परा।
मुझ पर दायित्व।
कंधों पर मेरे ज्यों, सहसा रख दी हो
किसी ने वसुंधरा।
सौंप मझे मर्यादाहीन लोक
टूटी पडी है परम्परा।

8 नवंबर 2016


कोसल में विचारों की कमी है

प्रेषक : धर्मेंद्र कुमार

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महाराज बधाई हो; महाराज की जय हो !

युद्ध नहीं हुआ –

लौट गये शत्रु ।


वैसे हमारी तैयारी पूरी थी !

चार अक्षौहिणी थीं सेनाएं

दस सहस्र अश्व

लगभग इतने ही हाथी ।


कोई कसर न थी ।

युद्ध होता भी तो

नतीजा यही होता ।


न उनके पास अस्त्र थे

न अश्व

न हाथी

युद्ध हो भी कैसे सकता था !

निहत्थे थे वे ।


उनमें से हरेक अकेला था

और हरेक यह कहता था

प्रत्येक अकेला होता है !

जो भी हो

जय यह आपकी है ।

बधाई हो !


राजसूय पूरा हुआ

आप चक्रवर्ती हुए –


वे सिर्फ़ कुछ प्रश्न छोड़ गये हैं

जैसे कि यह –

कोसल अधिक दिन नहीं टिक सकता

कोसल में विचारों की कमी है ।

राजनीतिज्ञों ने मुझे

प्रेषक : धर्मेंद्र कुमार

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राजनीतिज्ञों ने मुझे पूरी तरह भुला 
दिया।
अच्छा ही हुआ।
मुझे भी उन्हें भुला देना चाहिये।

बहुत से मित्र हैं, जिन्होंने आँखे फेर 
ली हैं,
कतराने लगे हैं
शायद वे सोचते हैं 
अब मेरे पास बचा क्या है?

मैं उन्हें क्या दे सकता हूँ?
और यह सच है
मैं उन्हे कुछ नहीं दे सकता।
मगर कोई मुझसे
मेरा "स्वत्व" नहीं छीन सकता।
मेरी कलम नहीं छीन सकता

यह कलम
जिसे मैंने राजनीति के धूल- धक्कड़ के बीच भी
हिफाजत से रखा
हर हालत में लिखता रहा

पूछो तो इसी के सहारे 
जीता रहा
यही मेरी बैसाखी थी
इसी ने मुझसे बार बार कहा,
"हारिये ना हिम्मत बिसारिये ना राम।"
हिम्मत तो मैं कई बार हारा
मगर राम को मैंने
कभी नहीं बिसारा।
यही मेरी कलम
जो इस तरह मेरी है कि किसी और की
नहीं हो सकती
मुझे भवसागर पार करवाएगी
वैतरणी जैसे भी
हो,
पार कर ही लूँगा।

कुछ का व्यवहार बदल गया

प्रेषक : धर्मेंद्र कुमार

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कुछ का व्यवहार बदल गया। कुछ का नहीं 
बदला।
जिनसे उम्मीद थी, नहीं बदलेगा
उनका बदल गया।
जिनसे आशंका थी,
नहीं बदला।
जिन्हें कोयला मानता था
हीरों की तरह 
चमक उठे।
जिन्हें हीरा मानता था
कोयलों की तरह 
काले निकले।

सिर्फ अभी रुख बदला है, आँखे बदली है,
रास्ता बदला है।
अभी देखो
क्या होता है,
क्या क्या नहीं होता।
अभी तुम सड़कों पर घसीटे जाओगे,
अभी तुम घसिआरे पुकारे जाओगे
अभी एक एक करके
सभी खिड़कियाँ बन्द होंगी
और तब भी तुम अपनी 
खिड़की खुली 
रखोगे,
इस डर से कि 
जरा सी भी अपनी 
खिड़की बन्द की तो
बाहर से एक पत्थर
एक घृणा का पत्थर
एक हीनता का पत्थर
एक प्रतिद्वन्दिता का पत्थर
एक विस्मय का पत्थर
एक मानवीय पत्थर
एक पैशाचिक पत्थर
एक दैवी पत्थर
तुम्हारी खिड़की के शीशे तोड़ कर जाएगा
और तुम पहले से अधिक विकृत नजर आओगे
पहले से अधिक
बिलखते बिसूरते नजर पड़ोगे
जैसा कि तुम दिखना नहीं चाहते
दिखाई पड़ोगे।

यह कोई पहली बार नहीं है
जब तुम्हें मार पड़ी है
कम से कम तीन तो
आज को मिला कर
हो चुके
मतलब है तीन बार,
मार।
और ऐसी मार कि तीनों बार
बिलबिला गया
निराला की कविता याद आती है
"जब कड़ी मारे पड़ीं,
दिल हिल गया।"

निरापद कोई नहीं है

प्रेषक : धर्मेंद्र कुमार

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ना निरापद कोई नहीं है
न तुम, न मैं, न वे
न वे, न मैं, न तुम
सबके पीछे बंधी है दुम आसक्ति की!

आसक्ति के आनन्द का छंद ऐसा ही है
इसकी दुम पर 
पैसा है!

ना निरापद कोई नहीं है
ठीक आदमकद कोई नहीं है
न मैं, न तुम, न वे
न तुम, न मैं, न वे

कोई है कोई है कोई है 
जिसकी ज़िंदगी 
दूध की धोई है

ना, दूध किसी का धोबी नहीं है
हो तो भी नहीं है!

जंगल के राजा !

प्रेषक : धर्मेंद्र कुमार

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जंगल के राजा, सावधान !
ओ मेरे राजा, सावधान !
                     कुछ अशुभ शकुन हो रहे आज l 
           जो दूर शब्द सुन पड़ता है,
           वह मेरे जी में गड़ता है,
                     रे इस हलचल पर पड़े गाज l 
           ये यात्री या कि किसान नहीं,
           उनकी-सी इनकी बान नहीं,
                     चुपके चुपके यह बोल रहे । 
           यात्री होते तो गाते तो,
           आगी थोड़ी सुलगाते तो,
                     ये तो कुछ विष-सा बोल रहे । 
           वे एक एक कर बढ़ते हैं,
           लो सब झाड़ों पर चढ़ते हैं,
                     राजा ! झाड़ों पर है मचान । 
           जंगलके राजा, सावधान !
                     ओ मेरे राजा, सावधान !
           राजा गुस्से में मत आना,
           तुम उन लोगों तक मत जाना ;
                     वे सब-के-सब हत्यारे हैं । 
          वे दूर बैठकर मारेंगे,
          तुमसे कैसे वे हारेंगे,
                     माना, नख तेज़ तुम्हारे हैं । 
           "ये मुझको खाते नहीं कभी,
            फिर क्यों मारेंगे मुझे अभी ?"
                     तुम सोच नहीं सकते राजा । 
            तुम बहुत वीर हो, भोले हो,
            तुम इसीलिए यह बोले हो,
                     तुम कहीं सोच सकते राजा । 
            ये भूखे नहीं पियासे हैं,
            वैसे ये अच्छे खासे हैं,
                     है 'वाह वाह' की प्यास इन्हें । 
            ये शूर कहे जायँगे तब,
            और कुछ के मन भाएँगे तब,
                     है चमड़े की अभिलाष इन्हें,
             ये जग के, सर्व-श्रेष्ठ प्राणी,
             इनके दिमाग़, इनके वाणी,
                     फिर अनाचार यह मनमाना !
             राजा, गुस्से में मत आना,
                     तुम उन लोगों तक मत जाना ।

आभार

प्रेषक : धर्मेंद्र कुमार

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जिस जिससे पथ पर स्नेह मिला
उस उस राही को धन्यवाद।

जीवन अस्थिर अनजाने ही
हो जाता पथ पर मेल कहीं
सीमित पग-डग, लम्बी मंज़िल
तय कर लेना कुछ खेल नहीं

दाएँ-बाएँ सुख-दुख चलते
सम्मुख चलता पथ का प्रमाद
जिस जिससे पथ पर स्नेह मिला
उस उस राही को धन्यवाद।

साँसों पर अवलम्बित काया
जब चलते-चलते चूर हुई
दो स्नेह-शब्द मिल गए, मिली
नव स्फूर्ति थकावट दूर हुई

पथ के पहचाने छूट गए
पर साथ-साथ चल रही याद
जिस जिससे पथ पर स्नेह मिला
उस उस राही को धन्यवाद।

जो साथ न मेरा दे पाए
उनसे कब सूनी हुई डगर
मैं भी न चलूँ यदि तो भी क्या
राही मर लेकिन राह अमर

इस पथ पर वे ही चलते हैं
जो चलने का पा गए स्वाद
जिस जिससे पथ पर स्नेह मिला
उस उस राही को धन्यवाद।

कैसे चल पाता यदि न मिला
होता मुझको आकुल-अन्तर
कैसे चल पाता यदि मिलते
चिर-तृप्ति अमरता-पूर्ण प्रहर

आभारी हूँ मैं उन सबका
दे गए व्यथा का जो प्रसाद
जिस जिससे पथ पर स्नेह मिला
उस उस राही को धन्यवाद।

सूनी साँझ

प्रेषक : धर्मेंद्र कुमार

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बहुत दिनों में आज मिली है
साँझ अकेली, साथ नहीं हो तुम।

पेड खडे फैलाए बाँहें
लौट रहे घर को चरवाहे
यह गोधुली, साथ नहीं हो तुम,

बहुत दिनों में आज मिली है
साँझ अकेली, साथ नहीं हो तुम।

कुलबुल कुलबुल नीड़-नीड़ में
चहचह चहचह मीड़-मीड़ में
धुन अलबेली, साथ नहीं हो तुम,

बहुत दिनों में आज मिली है
साँझ अकेली, साथ नहीं हो तुम।

जागी-जागी सोई-सोई
पास पडी है खोई-खोई
निशा लजीली, साथ नहीं हो तुम,

बहुत दिनों में आज मिली है
साँझ अकेली, साथ नहीं हो तुम।

ऊँचे स्वर से गाते निर्झर
उमडी धारा, जैसी मुझपर-
बीती झेली, साथ नहीं हो तुम,

बहुत दिनों में आज मिली है
साँझ अकेली, साथ नहीं हो तुम।

यह कैसी होनी-अनहोनी
पुतली-पुतली आँख मिचौनी
खुलकर खेली, साथ नहीं हो तुम,

बहुत दिनों में आज मिली है
साँझ अकेली, साथ नहीं हो तुम।

याद

प्रेषक : धर्मेंद्र कुमार

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बिदा हो गई साँझ, विनत मुख पर झीना आँचल धर,
मेरे एकाकी आँगन में मौन मधुर स्मृतियाँ भर!
वह केसरी दुकूल अभी भी फहरा रहा क्षितिज पर,
नव असाढ़ के मेघों से घिर रहा बराबर अंबर!

मैं बरामदे में लेटा, शैय्या पर, पीड़ित अवयव, 
मन का साथी बना बादलों का विषाद है नीरव! 
सक्रिय यह सकरुण विषाद,--मेघों से उमड़ उमड़ कर 
भावी के बहु स्वप्न, भाव बहु व्यथित कर रहे अंतर!

मुखर विरह दादुर पुकारता उत्कंठित भेकी को, 
बर्हभार से मोर लुभाता मेघ-मुग्ध केकी को; 
आलोकित हो उठता सुख से मेघों का नभ चंचल, 
अंतरतम में एक मधुर स्मृति जग जग उठती प्रतिपल!

कम्पित करता वक्ष धरा का घन गभीर गर्जन स्वर, 
भू पर ही आगया उतर शत धाराओं में अंबर! 
भीनी भीनी भाप सहज ही साँसों में घुल मिल कर 
एक और भी मधुर गंध से हृदय दे रही है भर!

नव असाढ़ की संध्या में, मेघों के तम में कोमल, 
पीड़ित एकाकी शय्या पर, शत भावों से विह्वल, 
एक मधुरतम स्मृति पल भर विद्युत सी जल कर उज्वल 
याद दिलाती मुझे हृदय में रहती जो तुम निश्चल!

मैं सबसे छोटी होऊँ

प्रेषक : धर्मेंद्र कुमार

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मैं सबसे छोटी होऊँ,
तेरी गोदी में सोऊँ,
तेरा अंचल पकड़-पकड़कर
फिरू सदा माँ! तेरे साथ,
कभी न छोड़ूँ तेरा हाथ!
बड़ा बनकर पहले हमको
तू पीछे छलती है मात!
हाथ पकड़ फिर सदा हमारे
साथ नहीं फिरती दिन-रात!
अपने कर से खिला, धुला मुख,
धूल पोंछ, सज्जित कर गात,
थमा खिलौने, नहीं सुनाती 
हमें सुखद परियों की बात!
ऐसी बड़ी न होऊँ मैं
तेरा स्‍नेह न खोऊँ मैं,
तेरे अंचल की छाया में
छिपी रहूँ निस्‍पृह, निर्भय,
कहूँ-दिखा दे चंद्रोदय!

30 सितंबर 2016


मैंने लिखा कुछ भी नहीं

प्रेषक : धर्मेंद्र कुमार

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मैंने लिखा कुछ भी नहीं
तुम ने पढ़ा कुछ भी नहीं ।

जो भी लिखा दिल से लिखा
इस के सिवा कुछ भी नहीं ।

मुझ से ज़माना है ख़फ़ा
मेरी ख़ता कुछ भी नहीं ।

तुम तो खुदा के बन्दे हो
मेरा खुदा कुछ भी नहीं ।

मैं ने उस पर जान दी
उस को वफ़ा कुछ भी नहीं ।

चाहा तुम्हें यह अब कहूँ
लेकिन कहा कुछ भी नहीं ।

यह तो नज़र की बात है
अच्छा बुरा कुछ भी नहीं ।

12 सितंबर 2016


नयनों की रेशम डोरी से

प्रेषक : धर्मेंद्र कुमार

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नयनों की रेशम डोरी से 
अपनी कोमल बरजोरी से। 

रहने दो इसको निर्जन में 
बांधो मत मधुमय बन्धन में, 
एकाकी ही है भला यहाँ, 
निठुराई की झकझोरी से। 

अन्तरतम तक तुम भेद रहे, 
प्राणों के कण कण छेद रहे। 
मत अपने मन में कसो मुझे 
इस ममता की गँठजोरी से। 

निष्ठुर न बनो मेरे चंचल 
रहने दो कोरा ही अंचल, 
मत अरूण करो हे तरूण किरण। 
अपनी करूणा की रोरी से।

गिरिराज

प्रेषक : धर्मेंद्र कुमार

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यह है भारत का शुभ्र मुकुट 
यह है भारत का उच्च भाल, 
सामने अचल जो खड़ा हुआ 
हिमगिरि विशाल, गिरिवर विशाल! 

कितना उज्ज्वल, कितना शीतल 
कितना सुन्दर इसका स्वरूप? 
है चूम रहा गगनांगन को 
इसका उन्नत मस्तक अनूप! 

है मानसरोवर यहीं कहीं 
जिसमें मोती चुगते मराल, 
हैं यहीं कहीं कैलास शिखर 
जिसमें रहते शंकर कृपाल! 

युग युग से यह है अचल खड़ा 
बनकर स्वदेश का शुभ्र छत्र! 
इसके अँचल में बहती हैं 
गंगा सजकर नवफूल पत्र! 

इस जगती में जितने गिरि हैं 
सब झुक करते इसको प्रणाम, 
गिरिराज यही, नगराज यही 
जननी का गौरव गर्व–धाम! 

इस पार हमारा भारत है, 
उस पार चीन–जापान देश 
मध्यस्थ खड़ा है दोनों में 
एशिया खंड का यह नगेश!

खादी के धागे-धागे में

प्रेषक : धर्मेंद्र कुमार

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खादी के धागे-धागे में अपनेपन का अभिमान भरा,
माता का इसमें मान भरा, अन्यायी का अपमान भरा।

खादी के रेशे-रेशे में अपने भाई का प्यार भरा,
मां-बहनों का सत्कार भरा, बच्चों का मधुर दुलार भरा।

खादी की रजत चंद्रिका जब, आकर तन पर मुसकाती है,
जब नव-जीवन की नई ज्योति अंतस्थल में जग जाती है।

खादी से दीन निहत्थों की उत्तप्त उसांस निकलती है,
जिससे मानव क्या, पत्थर की भी छाती कड़ी पिघलती है।

खादी में कितने ही दलितों के दग्ध हृदय की दाह छिपी,
कितनों की कसक कराह छिपी, कितनों की आहत आह छिपी।

खादी में कितनी ही नंगों-भिखमंगों की है आस छिपी,
कितनों की इसमें भूख छिपी, कितनों की इसमें प्यास छिपी।

खादी तो कोई लड़ने का, है भड़कीला रणगान नहीं,
खादी है तीर-कमान नहीं, खादी है खड्ग-कृपाण नहीं।

खादी को देख-देख तो भी दुश्मन का दिल थहराता है,
खादी का झंडा सत्य, शुभ्र अब सभी ओर फहराता है।

खादी की गंगा जब सिर से पैरों तक बह लहराती है,
जीवन के कोने-कोने की, तब सब कालिख धुल जाती है।

खादी का ताज चांद-सा जब, मस्तक पर चमक दिखाता है,
कितने ही अत्याचार ग्रस्त दीनों के त्रास मिटाता है।

खादी ही भर-भर देश प्रेम का प्याला मधुर पिलाएगी,
खादी ही दे-दे संजीवन, मुर्दों को पुनः जिलाएगी।

खादी ही बढ़, चरणों पर पड़ नुपूर-सी लिपट मना लेगी,
खादी ही भारत से रूठी आज़ादी को घर लाएगी।

अलि रचो छंद

प्रेषक : धर्मेंद्र कुमार

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अलि रचो छंद
आज कण कण कनक कुंदन,
आज तृण तृण हरित चंदन,
आज क्षण क्षण चरण वंदन 
विनय अनुनय लालसा है। 
आज वासन्ती उषा है।

अलि रचो छंद 
आज आई मधुर बेला, 
अब करो मत निठुर खेला,
मिलन का हो मधुर मेला 
आज अथरों में तृषा है। 
आज वासंती उषा है।

अलि रचो छंद 
मधु के मधु ऋतु के सौरभ के, 
उल्लास भरे अवनी नभ के,
जडजीवन का हिम पिघल चले
हो स्वर्ण भरा प्रतिचरण मंद
अलि रचो छंद।

आया वसंत

प्रेषक : धर्मेंद्र कुमार

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आया वसंत आया वसंत
छाई जग में शोभा अनंत।

सरसों खेतों में उठी फूल
बौरें आमों में उठीं झूल
बेलों में फूले नये फूल

पल में पतझड़ का हुआ अंत
आया वसंत आया वसंत।

लेकर सुगंध बह रहा पवन
हरियाली छाई है बन बन,
सुंदर लगता है घर आँगन

है आज मधुर सब दिग दिगंत
आया वसंत आया वसंत।

भौरे गाते हैं नया गान,
कोकिला छेड़ती कुहू तान
हैं सब जीवों के सुखी प्राण,

इस सुख का हो अब नही अंत
घर-घर में छाये नित वसंत।
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