22 फ़रवरी 2017


अवकाश की कमी

प्रेषक : धर्मेंद्र कुमार

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संध्या को मैं रह न सकूँगी . 
एक मित्र ने बुलवाया है 
कुछ विरोध में कह न सकूँगी . 

विद्यापति का फ़िल्म आया है,
हम दोनों को वह भाया है .
दुःख होगा यदि साथ न जाऊँ,
जिस दुःख को मैं सह न सकूँगी . 

मैं तो हूँगी शीघ्र रवाना, 
आज बना लेना तुम खाना .
आज रसोई की धारा में,
प्रियतम, मैं तो बह न सकूँगी .

शरबत भला बनाऊँ कैसे,
मोल मँगा लो देकर पैसे 
अभी-अभी क्यूटेक्स लगाया है
मैं दधिको मह न सकूँगी 

बसंत ऋतु

प्रेषक : धर्मेंद्र कुमार

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आगया मधुमास आली
दिवसभर वह पाठ पढ़ते
नित्य प्रातः हैं टहलते 
और आधी रात तक तो 
जागती है सास आली; आ गया मधुमास आली 

जब कहा - मुझको दिखा दो 
एक दिन सिनेमा भला तो;
बोल उठे संध्या समय 
लगता हमारा क्लास आली; आ गया मधुमास आली

ढ़ाक और कचनार फूले 
आम के भी बौर झूले 
रट रहे हैं किन्तु वह 
तद्धित-कृदंत-समास आली; आ गया मधुमास आली

'सेंट' माँगा; सोप माँगा,
ह्रदय को कुछ होप माँगा 
हम यही कहते रहे --
हो जानी जब हम पास आली; आ गया मधुमास आली 
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